महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार दो घड़ीतक आगे बढ़नेपर अर्जुनने विराटकुमार उत्तरसे कहा— ।। १९ ।। अर्जुन उवाच एकान्तं रथमास्थाय पद्भ्यां त्वमवपीडयन् । दृढं च रश्मीन् संयच्छ शङ्खं ध्मास्याम्यहं पुनः ।। २० ।। **अर्जुन बोले—**राजकुमार! अब तुम रथपर अच्छी तरह जमकर बैठ जाओ और अपनी टाँगोंसे बैठनेके स्थानको जकड़ लो। साथ ही घोड़ोंकी रासको दृढ़तापूर्वक पकड़े रहो। मैं फिर शंख बजाऊँगा ।। २० ।। वैशम्पायन उवाच ततः शङ्खमुपाध्मासीद् दारयन्निव पर्वतान् । गुहा गिरीणां च तदा दिशः शैलांस्तथैव च । उत्तरश्चापि संलीनो रथोपस्थ उपविशत् ।। २१ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब अर्जुनने इतने जोरसे शंख बजाया मानो वे पर्वतों, पर्वतीय गुफाओं, सम्पूर्ण दिशाओं और बड़ी-बड़ी चट्टानोंको भी विदीर्ण कर डालेंगे। उत्तर इस बार भी रथके भीतरी भागमें छिपकर बैठ गया ।। २१ ।। तस्य शङ्खस्य शब्देन रथनेमिस्वनेन च । गाण्डीवस्य च घोषेण पृथिवी समकम्पत ।। २२ ।। उस शंखके शब्दसे, रथनेमियोंकी घर्घराहटसे तथा गाण्डीव धनुषकी टंकारसे धरती काँप उठी ।। २२ ।। तं समाश्वासयामास पुनरेव धनंजयः ।। २३ ।। तदनन्तर अर्जुनने उत्तरको पुनः धीरज बँधाया ।। २३ ।। द्रोण उवाच यथा रथस्य निर्घोषो यथा मेघ उदीर्यते । कम्पते च यथा भूमिर्नैषोऽन्यः सव्यसाचिनः ।। २४ ।। (यह शंख-ध्वनि सुनकर कौरवसेनामें) **द्रोणाचार्यने कहा—**जैसी यह रथकी घर्घराहट सुनायी दे रही है, जिस तरह उससे मेघगर्जनाका-सा शब्द हो रहा है और उसीके कारण जिस प्रकार यह पृथ्वी काँपने लगी है, इनसे यह सूचित होता है कि यह आनेवाला योद्धा अर्जुनके सिवा दूसरा कोई नहीं है ।। २४ ।। शस्त्राणि न प्रकाशन्ते प्रहृष्यन्ति वाजिनः । अग्नयश्च न भासन्ते समिद्धास्तन्न शोभनम् ।। २५ ।।