भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2419

उत्पाता विविधा घोरा दृश्यन्ते क्षत्रनाशनाः ॥ ३० ॥ सूर्य आदिका प्रकाश मंद पड़ गया है। भयंकर मृग और पक्षी सामने आ रहे हैं और क्षत्रियोंके संहारकी सूचना देनेवाले अनेक प्रकारके घोर उत्पात दिखायी देते हैं ॥ ३० ॥ विशेषत इहास्माकं निमित्तानि विनाशने । उल्काभिश्च प्रदीप्ताभिर्बाध्यते पृतना तव । वाहनान्यप्रहृष्टानि रुदन्तीव विशाम्पते ॥ ३१ ॥ राजा दुर्योधन! विशेषतः यहीं हमारे लिये विनाश-सूचक अपशकुन हो रहे हैं। तुम्हारी सेनाके ऊपर जलती हुई उल्काएँ गिर-गिरकर उसे पीड़ा देती हैं। तुम्हारे वाहन (हाथी-घोड़े) अप्रसन्न तथा रोते-से दीखते हैं ॥ ३१ ॥ उपासते च सैन्यानि गृध्रास्तव समन्ततः । तप्स्यसे वाहिनीं दृष्ट्वा पार्थबाणप्रपीडिताम् । पराभूता च वः सेना न कश्चिद् योद्धुमिच्छति ॥ ३२ ॥ सेनाके चारों ओर गीध बैठ रहे हैं, इससे जान पड़ता है; तुम अपनी सेनाको अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित होती देख मनमें संताप करोगे। तुम्हारी सेना अभीसे तिरस्कृत-सी हो रही है, कोई भी सैनिक युद्ध करना नहीं चाहता है ॥ ३२ ॥ विवर्णमुखभूयिष्ठाः सर्वे योधा विचेतसः । गाः सम्प्रस्थाप्य तिष्ठामो व्यूढानीका प्रहारिणः ॥ ३३ ॥ समस्त सैनिकोंके मुखपर भारी उदासी छा गयी है। सब अचेत—हतोत्साह हो रहे हैं। अतः हम गौओंको हस्तिनापुरकी ओर भेजकर सेनाकी व्यूहरचना करके शत्रुपर प्रहार करनेके लिये उद्यत हो जायँ ॥ ३३ ॥

इति श्रीमन्महाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे औत्पातिको नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके अवसरपर उत्पातसूचक अपशकुनसम्बन्धी छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३५ १/२ श्लोक हैं।)