भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2427

कुन्तीनन्दन धनंजय गुणवान् ब्राह्मणकी भाँति मेरे लिये एक सुपात्र व्यक्ति है। अतः आज वह मेरे छोड़े हुए सहस्रों बाणसमुदायोंका दान स्वीकार करे ।। ७ ।। एष चैव महेष्वासस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । अहं चापि नरश्रेष्ठादर्जुनान्नावरः क्वचित् ।। ८ ।। यह तीनों लोकोंमें महान् धनुर्धरके रूपमें विख्यात है और मैं भी नरश्रेष्ठ अर्जुनसे किसी बातमें कम नहीं हूँ ।। ८ ।। इतश्चेतश्च निर्मुक्तैः काञ्चनैर्गार्ध्रवाजितैः । दृश्यतामद्य वै व्योम खद्योतैरिव संवृतम् ।। ९ ।। इधर-उधर दोनों ओरसे छूटे हुए गीधकी पाँखोंसे युक्त सुवर्णमय बाणोंद्वारा आच्छादित हो आज आकाश जुगनुओंसे भरा हुआ-सा दिखायी देगा ।। ९ ।। अद्याहंऋणमक्षय्यं पुरा वाचा प्रतिश्रुतम् । धार्तराष्ट्राय दास्यामि निहत्य समरेऽर्जुनम् ।। १० ।। मैं आज युद्धमें अर्जुनको मारकर पहले की हुई अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार दुर्योधनका अक्षय ऋण चुका दूँगा ।। १० ।। अन्तराच्छिद्यमानानां पुङ्खानां व्यतिशीर्यताम् । शलभानामिवाकाशे प्रचारः सम्प्रदृश्यताम् ।। ११ ।। आज बीचसे कटकर इधर-उधर बिखर जानेवाले पंखयुक्त बाणोंका आकाशमें फतिंगोंकी भाँति उड़ना और गिरना देखो ।। ११ ।। इन्द्राशनिसमस्पर्शैर्महेन्द्रसमतेजसम् । अर्दयिष्याम्यहं पार्थमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ।। १२ ।। यद्यपि अर्जुन महेन्द्रके समान तेजस्वी है, तो भी आज उसे उल्काओं (मशालों) द्वारा गजराजकी भाँति इन्द्रके वज्रकी तरह कठोर स्पर्शवाले अपने बाणोंसे पीड़ित कर दूँगा ।। १२ ।। रथादतिरथं शूरं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । विवशं पार्थमादास्ये गरुत्मानिव पन्नगम् ।। १३ ।। जो रथियोंसे भी बढ़कर अतिरथी, सम्पूर्ण शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ और शूरवीर है, उस कुन्तीपुत्रको आज मैं युद्धमें विवश करके उसी प्रकार दबोच लूँगा, जैसे गरुड़ साँपको पकड़ लेता है ।। १३ ।। तमग्निमिव दुर्धर्षमसिहशक्तिशरेन्धनम् । पाण्डवाग्निमहं दीप्तं प्रदहन्तमिवार्हितम् ।। १४ ।। अश्ववेगपुरोवातो रथौघस्तनयित्नुमान् । शरधारो महामेघः शमयिष्यामि पाण्डवम् ।। १५ ।।