भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अश्वत्थामाके उद्गार

अश्वत्थामोवाच

न च तावज्जिता गावो न च सीमान्तरं गताः ।
न हास्तिनपुरं प्राप्तास्त्वं च कर्ण विकत्थसे ॥ १ ॥
अश्वत्थामाने कहा— कर्ण! अभी तो हमने न गौओंको जीता है, न मत्स्यदेशकी सीमाके बाहर जा सके हैं और न हस्तिनापुरमें ही पहुँच गये हैं। फिर तुम इतनी व्यर्थ बकवाद क्यों कर रहे हो? ॥ १ ॥

संग्रामांश्च बहून् जित्वा लब्ध्वा च विपुलं धनम् ।
विजित्य च परां सेनां नाहुः किंचन पौरुषम् ॥ २ ॥
दहत्यग्निरवाक्यस्तु तूष्णीं भाति दिवाकरः ।
तूष्णीं धारयते लोकान् वसुधा सचराचरान् ॥ ३ ॥
विद्वान् पुरुष बहुत-सी लड़ाइयाँ जीतकर, असंख्य धनराशि पाकर तथा शत्रुओंकी सेनाको परास्त करके भी इस तरह व्यर्थ बकवाद नहीं करते। आग बिना कुछ कहे-सुने ही सबको जलाकर भस्म कर देती है, सूर्यदेव मौन रहकर ही प्रकाशित होते हैं, पृथ्वी चुप रहकर ही सम्पूर्ण चराचर लोकोंको धारण करती है (इनमेंसे कोई अपने पराक्रमकी प्रशंसा नहीं करता) ॥ २-३ ॥

चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि विहितानि स्वयम्भुवा ।
धनं यैरधिगन्तव्यं यच्च कुर्वन् न दुष्यति ॥ ४ ॥
ब्रह्माजीने चारों वर्णोंके कर्म नियत कर दिये हैं, जिनसे धन भी मिल सकता है और जिनका अनुष्ठान करनेसे कर्ता दोषका भागी नहीं होता ॥ ४ ॥

अधीत्य ब्राह्मणो वेदान् याजयेत यजेत वा ।
क्षत्रियो धनुराश्रित्य यजेच्चैव न याजयेत् ॥ ५ ॥
ब्राह्मण वेदोंको पढ़कर यज्ञ करावे अथवा करे। क्षत्रिय धनुषका आश्रय लेकर धन कमाये और यज्ञ करे; परंतु वह दूसरोंका यज्ञ न करावे (क्योंकि यह काम ब्राह्मणोंका है) ॥ ५ ॥

वैश्योऽधिगम्य वित्तानि ब्रह्मकर्माणि कारयेत् ।
शूद्रः शुश्रूषणं कुर्यात् त्रिषु वर्णेषु नित्यशः ।
वन्दनायोगविधिभिर्वेतसीं वृत्तिमास्थितः ॥ ६ ॥
वैश्य कृषि और व्यापार आदिके द्वारा धनोपार्जन करके ब्राह्मणोंके द्वारा वेदोक्त कर्म करावें और शूद्र वैतसीवृत्ति (बेंतके वृक्षकी भाँति नम्रता) का आश्रय ले प्रणाम और