भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2440

भवतां हि कृतास्त्रत्वं यथाऽऽदित्ये प्रभा तथा । यथा चन्द्रमसो लक्ष्मीः सर्वथा नापकृष्यते ॥ ७ ॥ जैसे सूर्यमें प्रभा और चन्द्रमामें लक्ष्मी (शोभा) सर्वथा विद्यमान रहती है—कभी कम नहीं होती, उसी प्रकार आपलोगोंका अस्त्रविद्यामें जो पाण्डित्य है, वह अक्षुण्ण है ॥ ७ ॥ एवं भवत्सु ब्राह्मण्यं ब्रह्मास्त्रं च प्रतिष्ठितम् । चत्वार एकतो वेदाः क्षात्रमेकत्र दृश्यते ॥ ८ ॥ इस प्रकार आपलोगोंमें ब्राह्मणत्व तथा ब्रह्मास्त्र दोनों ही प्रतिष्ठित हैं, यद्यपि प्रायः एक व्यक्तिमें चारों वेदोंका ज्ञान देखा जाता है, तो दूसरेमें क्षात्रधर्मका ॥ ८ ॥ नैतत् समस्तमुभयं कस्मिंश्चिदनुशुश्रुम । अन्यत्र भारताचार्यात् सपुत्रादिति मे मतिः ॥ ९ ॥ ये दोनों बातें पूर्णरूपसे किसी एक व्यक्तिमें हमने नहीं सुनी हैं। केवल भरतवंशियोंके आचार्य कृप, द्रोण और उनके पुत्र अश्वत्थामामें ही ये दोनों शक्तियाँ (ब्रह्मबल और क्षात्रबल) हैं। इनके सिवा और कहीं उक्त दोनों बातोंका एकत्र समावेश नहीं है। यह मेरा दृढ़ विश्वास है ॥ ९ ॥ वेदान्ताश्च पुराणानि इतिहासं पुरातनम् । जामदग्न्यमृते राजन् को द्रोणादधिको भवेत् ॥ १० ॥ राजन्! वेदान्त, पुराण और प्राचीन इतिहासके ज्ञानमें जमदग्निनन्दन परशुरामजीके सिवा दूसरा कौन मनुष्य द्रोणाचार्यसे बढ़कर हो सकता है? ॥ १० ॥ ब्रह्मास्त्रं चैव वेदाश्च नैतदन्यत्र दृश्यते । आचार्यपुत्रः क्षमतां नायं कालो विभेदने ॥ ११ ॥ सर्वे संहत्य युध्यामः पाकशासनिमागतम् ॥ १२ ॥ ब्रह्मास्त्र और वेद—ये दोनों वस्तुएँ हमारे आचार्योंके सिवा अन्यत्र कहीं नहीं देखी जातीं। आचार्यपुत्र क्षमा करें, यह समय आपसमें फूट पैदा करनेका नहीं है। हम सब लोग मिलकर यहाँ आये हुए अर्जुनसे युद्ध करेंगे ॥ ११-१२ ॥ बलस्य व्यसनानीह यान्युक्तानि मनीषिभिः । मुख्यो भेदो हि तेषां तु पापिष्ठो विदुषां मतः ॥ १३ ॥ मनीषी पुरुषोंने सेनाका विनाश करनेवाले जितने संकट बताये हैं, उनमें आपसकी फूट सबसे प्रधान कहा है। विद्वानोंने इस फूटको महान् पाप माना है ॥ १३ ॥

अश्वत्थामोवाच

नैव न्याय्यमिदं वाच्यमस्माकं पुरुषर्षभ । किं तु रोषपरीतेन गुरुणा भाषिता गुणाः ॥ १४ ॥