महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2446, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतद् वाक्यं रुरुचे तेषां भीष्मेणोक्तं महात्मना । तथा हि कृतवान् राजा कौरवाणामनन्तरम् ॥ २० ॥ भीष्मः प्रस्थाप्य राजानं गोधनं तदनन्तरम् । सेनामुख्यान् व्यवस्थाप्य व्यूहितुं सम्प्रचक्रमे ॥ २१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महात्मा भीष्मकी कही हुई यह बात सबको पसंद आ गयी। फिर कौरवोंके राजा दुर्योधनने वैसा ही किया। पहले राजा दुर्योधनको और उसके बाद गोधनको भेजकर सेनापतियोंको व्यवस्थित करके भीष्मजीने सेनाका व्यूह बनानेकी तैयारी की ॥ २०-२१ ॥
भीष्म उवाच
आचार्य मध्ये तिष्ठ त्वमश्वत्थामा तु सव्यतः । कृपः शारद्वतो धीमान् पार्श्वं रक्षतु दक्षिणम् ॥ २२ ॥ **भीष्मजी बोले—**आचार्य! आप बीचमें खड़े हों, अश्वत्थामा वामभागकी रक्षा करें और शरद्वान्के पुत्र बुद्धिमान् कृपाचार्य सेनाके दक्षिणभागकी रक्षा करें ॥ २२ ॥ अग्रतः सूतपुत्रस्तु कर्णस्तिष्ठतु दंशितः । अहं सर्वस्य सैन्यस्य पश्चात् स्थास्यामि पालयन् ॥ २३ ॥ सूतपुत्र कर्ण कवच धारण करके सेनाके आगे रहे और मैं पृष्ठभागकी रक्षा करता हुआ सम्पूर्ण सेनाके पीछे स्थित रहूँगा ॥ २३ ॥ (सर्वे महारथाः शूरा महेष्वासा महाबलाः । युद्ध्यन्तु पाण्डवश्रेष्ठमागतं यत्नतो युधि ॥ सभी महारथी महाधनुर्धर और महाबली शूरवीर योद्धा यहाँ आये हुए पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनके साथ रणभूमिमें यत्नपूर्वक युद्ध करें।
वैशम्पायन उवाच
अभेद्यं सर्वसैन्यानां व्यूह्य व्यूहं कुरुत्तमः । वज्रगर्भं व्रीहिमुखमर्धचक्रान्तमण्डलम् ॥ तस्य व्यूहस्य पश्चार्धे भीष्मश्चाथोद्यतायुधः । सौवर्णं तालमुच्छ्रित्य रथे तिष्ठन्नशोभत ॥) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर कुरुश्रेष्ठ भीष्मने समस्त सेनाओंका दुर्भेद्य व्यूह रचकर उसे वज्रगर्भ, व्रीहिमुख तथा अर्धचक्रान्तमण्डल आदिके रूपमें खड़ा किया और उसके पिछले भागमें भीष्मजी भी सुवर्णमय तालध्वज फहराकर हाथमें हथियार लिये खड़े हो गये। उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी।