भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2449

ये दो बाण एक साथ आकर मेरे पैरोंके आगे गिरे हैं और दूसरे दो बाण मेरे दोनों कानोंको छूकर निकल गये हैं ॥ ६ ॥ निरुष्य हि वने वासं कृत्वा कर्मातिमानुषम् । अभिवादयते पार्थः श्रोत्रे च परिपृच्छति ॥ ७ ॥ कुन्तीनन्दन अर्जुन वनमें रहकर वहाँ तपस्या तथा शौर्यद्वारा अतिमानुष (मानवी शक्तिके बाहरका) पराक्रम करके आज प्रकट हुए हैं। ये प्रथम दो बाणोंद्वारा मुझे प्रणाम कर रहे हैं और दूसरे दो बाणोंद्वारा कानोंमें युद्धके लिये आज्ञा माँगते हैं ॥ ७ ॥ चिरदृष्टोऽयमस्माभिः प्रज्ञावान् बान्धवप्रियः । अतीव ज्वलितो लक्ष्म्या पाण्डुपुत्रो धनंजयः ॥ ८ ॥ बन्धु-बान्धवोंको प्रिय लगनेवाले परम बुद्धिमान् अर्जुनको आज हमने दीर्घकालके बाद देखा है। अहा! पाण्डुपुत्र धनंजय अपनी दिव्य लक्ष्मी (शोभा) से अत्यन्त प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ८ ॥ रथी शरी चारुतली निषङ्गी शङ्खी पताकी कवची किरीटी । खड्गी च धन्वी च विभाति पार्थः शिखी वृतः स्रुग्भिरिवाज्यसिक्तः ॥ ९ ॥ रथपर बैठे हुए धनंजयने बाण, सुन्दर दस्ताने, तरकस, शंख, कवच, किरीट, खड्ग और धनुष धारण कर रखे हैं। इनके रथपर पताका फहरा रही है। इन सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर आज ये तेजस्वी पार्थ स्रुवा आदि यज्ञसाधनोंसे घिरे और घीकी आहुति पाकर प्रज्वलित हुए अग्निके समान शोभा पा रहे हैं ॥ ९ ॥

(वैशम्पायन उवाच

तमदूरमुपायान्तं दृष्ट्वा पाण्डवमर्जुनम् । नारयः प्रेक्षितुं शेकुस्तपन्तं हि यथा रविम् ॥ स तं दृष्ट्वा रथानीकं पार्थः सारथिमब्रवीत् ।) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तपते हुए सूर्यकी भाँति देदीप्यमान पाण्डुनन्दन अर्जुनको समीप आते देख शत्रु उनकी ओर दृष्टिपात न कर सके। रथियोंकी सेनाको सामने देख कुन्तीकुमार अर्जुनने सारथिसे कहा।

अर्जुन उवाच

इषुपाते च सेनाया हयान् संयच्छ सारथे । यावत् समीक्षे सैन्येऽस्मिन् क्वासौ कुरुकुलाधमः ॥ १० ॥ सर्वानैताननादृत्य दृष्ट्वा तमतिमानिनम् । तस्य मूर्ध्नि पतिष्यामि तत एते पराजिताः ॥ ११ ॥