महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2451, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैषोऽन्तरेण राजानं बीभत्सुः स्थातुमिच्छति । तस्य पाष्णिं ग्रहीष्यामो जवेनाभिप्रयास्यतः ॥ १७ ॥ 'ये अर्जुन राजा दुर्योधनके बिना ठहरना नहीं चाहते, इसलिये उधर ही बड़े वेगसे जा रहे हैं। अतः हमलोग शीघ्र चलकर इनका पीछा करें ॥ १७ ॥
न ह्येनमतिसंक्रुद्धमेको युध्येत संयुगे । अन्यो देवात् सहस्राक्षात् कृष्णाद् वा देवकीसुतात् । आचार्याच्च सपुत्राद् वा भारद्वाजान्महारथात् ॥ १८ ॥ 'इस समय ये बड़े क्रोधमें भरे हैं; अतः साक्षात् इन्द्र या देवकीनन्दन श्रीकृष्ण अथवा पुत्रसहित महारथी आचार्य द्रोणके सिवा दूसरा कोई इनके साथ अकेला युद्ध नहीं कर सकता ॥ १८ ॥
किं नो गावः करिष्यन्ति धनं वा विपुलं तथा । दुर्योधनः पार्थजले पुरा नौरिव मज्जति ॥ १९ ॥ 'ये गौएँ अथवा प्रचुर धन हमें क्या लाभ पहुँचायेंगे? राजा दुर्योधन पार्थरूपी जलमें पुरानी नावकी भाँति डूबना चाहता है ॥ १९ ॥
तथैव गत्वा बीभत्सुर्नाम विश्राव्य चात्मनः । शलभैरिव तां सेनां शरैः शीघ्रमवाकिरत् ॥ २० ॥ उधर अर्जुन उसी प्रकार रथसे दुर्योधनके पास पहुँच गये और उच्चस्वरसे अपना नाम सुनाकर बड़ी शीघ्रतासे कौरवसेनापर टिड्डीदलोंकी भाँति असंख्य बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २० ॥
कीर्यमाणाः शरौघैस्तु योधास्ते पार्थचोदितैः । नापश्यन्नावृतां भूमिं नान्तरिक्षं च पत्रिभिः ॥ २१ ॥ अर्जुनके छोड़े हुए बाणसमूहोंसे आच्छादित होकर वे समस्त सैनिक कुछ देख नहीं पाते थे। पृथ्वी और आकाश भी बाणोंसे ढँक गये थे ॥ २१ ॥
तेषामापततां युद्धे नापयानेऽभवन्मतिः । शीघ्रत्वमेव पार्थस्य पूजयन्ति स्म चेतसा ॥ २२ ॥ युद्धमें बाणोंकी मार खाकर कौरवसैनिक धराशायी होते जा रहे थे, तो भी उनका मन वहाँसे भागनेको नहीं होता था। वे मन-ही-मन अर्जुनकी फुर्तीकी सराहना करते थे ॥ २२ ॥
ततः शङ्खं प्रदध्मौ स द्विषतां लोमहर्षणम् । विस्फार्य च धनुःश्रेष्ठं ध्वजे भूतान्यचोदयत् ॥ २३ ॥ तदनन्तर पार्थने अपना शंख बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। फिर उन्होंने अपने श्रेष्ठ धनुषकी टंकार करके ध्वजापर बैठे हुए भूतोंको सिंहनाद करनेकी प्रेरणा दी ॥ २३ ॥
तस्य शङ्खस्य शब्देन रथनेमिस्वनेन च ।