महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2457, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंशोणाश्ववाहस्य हयान् निहत्य वैकर्तनभ्रातुरदीनसत्त्वः । एकेन संग्रामजितः शरेण शिरो जहाराथ किरीटमाली ॥ १८ ॥ उनके हृदयमें दीनताका लेश भी नहीं था। वे सुन्दर किरीट और मालाओंसे अलंकृत थे। उन्होंने लाल घोड़ेवाले रथपर बैठकर अपने सामने आये हुए कर्णके भाई संग्रामजित्के घोड़ोंको मार डाला और एक बाणसे उसके मस्तकको भी धड़से अलग कर दिया ॥ १८ ॥
तस्मिन् हते भ्रातरि सूतपुत्रो वैकर्तनो वीर्यमथाददानः । प्रगृह्य दन्ताविव नागराजो महर्षभं व्याघ्र इवाभ्यधावत् ॥ १९ ॥ अपने भाई संग्रामजित्के मारे जानेपर सूतपुत्र कर्णने कुपित हो पराक्रम दिखानेकी इच्छासे अर्जुन और उत्तरपर इस प्रकार हठपूर्वक धावा किया, मानो कोई गजराज दो पर्वतशिखरोंसे भिड़ने चला हो अथवा कोई व्याघ्र किसी महाबली साँड़पर टूट पड़ा हो ॥ १९ ॥
स पाण्डवं द्वादशभिः पृषत्कै- वैकर्तनः शीघ्रमथो जघान । विव्याध गात्रेषु हयांश्च सर्वान् विराटपुत्रं च करे निजघ्ने ॥ २० ॥ सूर्यपुत्र कर्णने बड़ी शीघ्रताके साथ पाण्डुनन्दन अर्जुनको बारह बाणोंसे घायल किया, उनके घोड़ोंके शरीर छेदकर छलनी कर दिये और विराटपुत्र उत्तरके हाथमें भी भारी चोट पहुँचायी ॥ २० ॥
तमापतन्तं सहसा किरीटी वैकर्तनं वै तरसाभिपत्य । प्रगृह्य वेगं न्यपतज्जवेन नागं गरुत्मानिव चित्रपक्षः ॥ २१ ॥ कर्णको सहसा आते देख किरीटधारी अर्जुन भी तीव्र गतिसे आगे बढ़कर जैसे विचित्र पंखवाले गरुड़ किसी नागपर जोरसे आक्रमण करते हों, उसी प्रकार बड़े वेगसे उसपर टूट पड़े ॥ २१ ॥
तावुत्तमौ सर्वधनुर्धराणां महाबलौ सर्वसपत्नसाहौ । कर्णस्य पार्थस्य निशम्य युद्धं दिदृक्षमाणाः कुरवोऽभितस्थुः ॥ २२ ॥