भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2466, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2466

यथा भवेत् तथा जज्ञे रथमार्गः किरीटिनः ॥ २७ ॥ जैसे वनमें एक साथ चलते हुए सहस्रों हाथियोंके पदचिह्नोंसे बहुत साफ और चौड़ा रास्ता बन जाता है, उसी प्रकार किरीटधारी अर्जुनके रथका मार्ग भी उनकी बाणवर्षासे साफ हो जाता था ॥ २७ ॥

नूनं पार्थजयैषित्वाच्छक्रः सर्वामरैः सह । हन्त्यस्मानित्यमन्यन्त पार्थेन निहताः परे ॥ २८ ॥ अर्जुनके बाणोंसे घायल हुए शत्रु ऐसा समझते थे कि निश्चय ही अर्जुनकी विजयकी अभिलाषा रखनेके कारण साक्षात् इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर हमें मार रहे हैं ॥ २८ ॥

घ्नन्तमत्यर्थमहितान् विजयं तत्र मेनिरे । कालमर्जुनरूपेण संहरन्तमिव प्रजाः ॥ २९ ॥ उस समरभूमिमें असंख्य शत्रुओंका संहार करते हुए पार्थकी ओर देखकर लोग यह मानने लगे कि अर्जुनके रूपमें साक्षात् काल ही आकर सबका संहार कर रहा है ॥ २९ ॥

कुरुसेनाशरीराणि पार्थेनैवाहतान्यपि । सेदुः पार्थहतानीव पार्थकर्मानुशासनात् ॥ ३० ॥ कौरव-योद्धाओंके शरीर कुन्तीनन्दन अर्जुनके बाणोंसे घायल होकर छिन्न-भिन्न हो गये थे। वे पार्थके बाणोंसे मरे हुएकी ही भाँति पड़े थे; क्योंकि पार्थके इस अद्भुत पराक्रमकी उन्हींसे उपमा दी जा सकती है ॥ ३० ॥

ओषधीनां शिरांसीव द्विषच्छीर्षाणि सोऽन्वयात् । अवनेश्रुः कुरूणां हि वीर्याण्यर्जुनजाद् भयात् ॥ ३१ ॥ वे धानकी बालके समान शत्रुओंके सिर क्रमशः काटते जाते थे। अर्जुनके भयसे कौरवोंकी सारी शक्ति नष्ट हो गयी थी ॥ ३१ ॥

अर्जुनानिलभिन्नानि वनान्यर्जुनविद्विषाम् । चक्रुर्लोहितधाराभिर्धरणीं लोहितान्तराम् ॥ ३२ ॥ अर्जुनके शत्रुरूपी वन अर्जुनरूपी वायुसे ही छिन्न-भिन्न हो लाल धाराएँ (रक्त) बहाकर पृथ्वीको भी लाल करने लगे ॥ ३२ ॥

लोहितेन समायुक्तैः पांसुभिः पवनोध्दुतैः । बभूवुर्लोहितास्तत्र भृशमादित्यरश्मयः ॥ ३३ ॥ वायुद्वारा उड़ायी हुई रक्तसे सनी धूलके संसर्गसे आकाशमें सूर्यकी किरणें भी अधिक लाल हो गयीं ॥ ३३ ॥

सार्कं खं तत्क्षणेनासीत् संध्यायामिव लोहितम् । अप्यस्तं प्राप्य सूर्योऽपि निवर्तेत न पाण्डवः ॥ ३४ ॥

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