महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2478, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंविव्याध दशभिर्बाणैस्त्वरितः कङ्कपत्रिभिः ॥ २५ ॥ किंतु कृपाचार्यने पुनः अपना स्थान ग्रहण कर लेनेपर तुरंत ही सफेद चीलके पंखोंसे युक्त दस बाणोंका प्रहार करके सव्यसाची अर्जुनको बींध डाला ॥ २५ ॥ ततः पार्थो धनुस्तस्य भल्लेन निशितेन ह । चिच्छेदैकेन भूयश्च हस्तावापमथाहरत् ॥ २६ ॥ तब अर्जुनने एक तीखे भल्ल नामक बाणद्वारा कृपाचार्यका धनुष काट डाला और पुनः उनके दस्तानेको नष्ट कर दिया ॥ २६ ॥ अथास्य कवचं बाणैर्निशितैर्मर्मभेदिभिः । व्यधमन्न च पार्थोऽस्य शरीरमवपीडयत् ॥ २७ ॥ उसके बाद पार्थने मर्मभेदी तीखे बाणोंद्वारा उनके कवचको भी छिन्न-भिन्न कर दिया, किंतु उनके शरीरको तनिक भी कष्ट नहीं पहुँचाया ॥ २७ ॥ तस्य निर्मुच्यमानस्य कवचात् काय आबभौ । समये मुच्यमानस्य सर्पस्येव तनूर्यथा ॥ २८ ॥ कवचसे मुक्त होनेपर कृपाचार्यका शरीर इस प्रकार सुशोभित हुआ, मानो समयपर केंचुल छूटनेके बाद सर्पका शरीर सुशोभित हो रहा हो ॥ २८ ॥ छिन्ने धनुषि पार्थेन सोऽन्यदादाय कार्मुकम् । चकार गौतमः सज्यं तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २९ ॥ अर्जुनद्वारा धनुष काट दिये जानेपर गौतम (कृप) ने दूसरा धनुष लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा ली। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ २९ ॥ स तदप्यस्य कौन्तेयश्चिच्छेद नतपर्वणा । एवमन्यानि चापानि बहूनि कृतहस्तवत् । शारद्वतस्य चिच्छेद पाण्डवः परवीरहा ॥ ३० ॥ परंतु कुन्तीनन्दनने झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे उनके उस धनुषको भी काट दिया और इसी प्रकार कृपाचार्यके बहुत-से दूसरे धनुष भी शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुनन्दनने हाथकी फुर्ती दिखानेमें कुशल वीरकी भाँति छिन्न-भिन्न कर डाले ॥ ३० ॥ स च्छिन्नधनुरादाय रथशक्तिं प्रतापवान् । प्राहिणोत् पाण्डुपुत्राय प्रदीप्तामशनीमिव ॥ ३१ ॥ इस तरह धनुष कट जानेपर प्रतापी कृपाचार्यने पाण्डुपुत्र अर्जुनपर वज्रकी भाँति प्रज्वलित रथशक्ति चलायी ॥ ३१ ॥ तामर्जुनस्तदाऽऽयान्तीं शक्तिं हेमविभूषिताम् । वियद्गतां महोल्काभां चिच्छेद दशभिः शरैः ॥ ३२ ॥ सापतद् दशधा छिन्ना भूमौ पार्थेन धीमता ॥ ३३ ॥