भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2489

उस समय प्राणोंकी बाजी लगाकर (युद्धका जूआ खेला जा रहा था।) दोनों वीर धनुषको कानतक खींचकर छोड़े हुए झुकी गाँठवाले बाणोंसे एक-दूसरेको विदीर्ण कर रहे थे॥ ६०॥ अथान्तरिक्षे नादोऽभूद् द्रोणं तत्र प्रशंसताम् । दुष्करं कृतवान् द्रोणो यदर्जुनमयोधयत् ॥ ६१ ॥ प्रमाथिनं महावीर्यं दृढमुष्टिं दुरासदम् । जेतारं देवदैत्यानां सर्वेषां च महारथम् ॥ ६२ ॥ इसी समय आचार्य द्रोणकी प्रशंसा करनेवाले देवताओंका यह शब्द आकाशमें गूँज उठा—‘अहो! द्रोणाचार्यने बड़ा दुष्कर कार्य किया कि अबतक अर्जुनके साथ युद्धमें डटे रह गये। ये अर्जुन तो शत्रुओंको मथ डालनेवाले, महापराक्रमी, दृढ़ मुष्टिवाले, दुर्धर्ष तथा सम्पूर्ण देवताओं और दैत्योंको जीतनेवाले महारथी वीर हैं’॥ ६१-६२॥ अविभ्रमं च शिक्षां च लाघवं दूरपातिताम् । पार्थस्य समरे दृष्ट्वा द्रोणस्याभूच्च विस्मयः ॥ ६३ ॥ उस समरभूमिमें अर्जुनका कभी न चूकनेका स्वभाव, अस्त्र-शस्त्रोंकी अद्भुत शिक्षा, हाथोंकी फुर्ती और दूरतक बाण मारनेकी शक्ति देखकर आचार्य द्रोणको भी बड़ा विस्मय हुआ॥ ६३॥ अथ गाण्डीवमुद्यम्य दिव्यं धनुरमर्षणः । विचकर्ष रणे पार्थो बाहुभ्यां भरतर्षभ ॥ ६४ ॥ जनमेजय! तदनन्तर रणभूमिमें कुन्तीपुत्रने दिव्य गाण्डीव धनुषको ऊँचे उठाकर कुपित हो उसे दोनों हाथोंसे खींचना आरम्भ किया॥ ६४॥ तस्य बाणमयं वर्षं शलभानामिवार्यतिम् । दृष्ट्वा ते विस्मिताः सर्वे साधु साध्वित्य पूजयन् ॥ ६५ ॥ फिर तो टिड्डियोंके झुंडके समान उनकी (अद्भुत) बाणवर्षा देखकर वे सभी सैनिक आश्चर्यचकित हो ‘साधु-साधु’ कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ६५॥ न च बाणान्तरे वायुरस्य शक्नोति सर्पितुम् । अनिशं संदधानस्य शरानुत्सृजतस्तथा ॥ ६६ ॥ ददर्श नान्तरं कश्चित् पार्थस्याददतोऽपि च ॥ ६७ ॥ उनके बाणोंके भीतर वायु भी प्रवेश नहीं कर पाती थी। कुन्तीनन्दन अर्जुन निरन्तर बाणोंको हाथमें लेते, धनुषपर रखते और छोड़ते थे। कोई भी उनकी इन क्रियाओंमें क्षणभरका भी अन्तर नहीं देख पाता था॥ ६६-६७॥ तथा शीघ्रास्त्रयुद्धे तु वर्तमाने सुदारुणे । शीघ्रं शीघ्रतरं पार्थः शरानन्यानुदीरयत् ॥ ६८ ॥