महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2498, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोत्स्यसे हि मया सार्धमद्य द्रक्ष्यसि मे बलम् ॥ १४ ॥ कुन्तीकुमार! मेरे साथ युद्धका जो तेरा हौसला है, वह अभी-अभी प्रकट हुआ है। अतः अब मेरे साथ तेरा युद्ध होगा और आज तू मेरा बल स्वयं देख लेगा ॥ १४ ॥
अर्जुन उवाच
इदानीमेव तावत् त्वमपयातो रणान्मम । तेन जीवसि राधेय निहतस्त्वनुजस्तव ॥ १५ ॥ **अर्जुन बोले—**राधापुत्र! अभी कुछ ही देर पहलेकी बात है, मेरे सामने युद्धसे पीठ दिखाकर तू भाग गया था, इसीलिये अबतक जी रहा है; किंतु तेरा छोटा भाई मारा गया ॥ १५ ॥
भ्रातरं घातयित्वा कस्त्यक्त्वा रणशिरश्च कः । त्वदन्यः कः पुमान् सत्सु ब्रूयादेवं व्यवस्थितः ॥ १६ ॥ तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपने भाईको मरवाकर और युद्धका मुहाना छोड़कर (भाग जानेके बाद भी) भलेमानसोंके बीचमें खड़ा हो ऐसी डींग मारेगा? ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इति कर्णं ब्रुवन्नेव बीभत्सुरपराजितः । अभ्ययाद् विसृजन् बाणान् कायावरणभेदिनः ॥ १७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुन किसीसे भी परास्त होनेवाले नहीं थे। वे कर्णसे उपर्युक्त बातें कहकर कवचको भी विदीर्ण कर देनेवाले बाण छोड़ते हुए उसकी ओर बढ़े ॥ १७ ॥
प्रतिजग्राह तं कर्णः प्रीयमाणो महारथः । महता शरवर्षेण वर्षमाणमिवाम्बुदम् ॥ १८ ॥ महारथी कर्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ मेघके सदृश बाणोंकी दृष्टि करनेवाले अर्जुनको अपने सायकोंकी भारी बौछार करके रोका ॥ १८ ॥
उत्पेतुः शरजालानि घोररूपाणि सर्वशः । अविध्यदश्वांश्च बाह्वोश्च हस्तावापं पृथक् पृथक् ॥ १९ ॥ सोऽमृष्यमाणः कर्णस्य निषङ्गस्यावलम्बनम् । चिच्छेद निशिताग्रेण शरेण नतपर्वणा ॥ २० ॥ फिर तो आकाशमें सब ओर भयंकर बाणोंके समूह उड़ने लगे। अर्जुनसे यह सहन न हो सका; अतः उन्होंने झुकी हुई गाँठ एवं तीखी नोकवाले बाणसे कर्णके घोड़ोंको बींध डाला। भुजाओंमें भी गहरी चोट पहुँचायी और हाथोंके दस्तानोंको भी पृथक्-पृथक् विदीर्ण