महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2502, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंगदापातेन महता शङ्खानां निःस्वनेन च ।। ७ ।। सिंहनादैश्च शूराणां गजानां बृंहितैस्तथा । गाण्डीवशब्देन भृशमशनिप्रतिमेन च । श्रुतिः स्मृतिश्च मे वीर प्रणष्टा मूढचेतसः ।। ८ ।। ‘युद्धमें इतने शूरवीरोंका जमघट मैंने पहले कभी नहीं देखा था। वीरवर! गदाओंके भारी आघात, शंखोंके भयंकर शब्द, शूरवीरोंके सिंहनाद, हाथियोंके चिग्घाड़ तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान गाण्डीव धनुषकी भारी टंकारध्वनिसे मेरा चित्त मोहित हो गया है। मेरी श्रवणशक्ति और स्मरणशक्ति भी जवाब दे चुकी है ।। ७-८ ।।
अलातचक्रप्रतिमं मण्डलं सततं त्वया । व्याक्षिप्यमाणं समरे गाण्डीवं च प्रकर्षता । दृष्टिः प्रचलिता वीर हृदयं दीर्यतीव मे ।। ९ ।। ‘रणभूमिमें आप निरन्तर गाण्डीव धनुषको खींचते और टंकारते रहते हैं, जिससे यह अलातचक्रके समान गोल प्रतीत होता है। उसे देखकर मेरी आँखें चौंधिया रही हैं तथा हृदय फटा-सा जा रहा है ।। ९ ।।
वपुश्चोग्रं तव रणे क्रुद्धस्येव पिनाकिनः । व्यायच्छतस्तव भुजं दृष्ट्वा भीर्मे भवत्यपि ।। १० ।। ‘इस संग्राममें कुपित हुए पिनाकपाणि भगवान् रुद्रकी भाँति आपका शरीर भयानक जान पड़ता है और लगातार धनुष-बाण चलानेके व्यायाममें संलग्न रहनेवाले आपकी भुजाओंको देखकर भी मुझे भय लगता है ।। १० ।।
नाददानं न संधानं न मुञ्चन्तं शरोत्तमान् । त्वामहं सम्प्रपश्यामि पश्यन्नपि न चेतनः ।। ११ ।। ‘आप कब उत्तम बाणोंको हाथमें लेते, कब धनुषपर रखते और कब उन्हें छोड़ते हैं, यह सब मैं नहीं देख पाता और देखनेपर भी मुझे चेत नहीं रहता ।। ११ ।।
अवसीदन्ति मे प्राणा भूरियं चलतीव च । न च प्रतोदं रश्मींश्च संयन्तुं शक्तिरस्ति मे ।। १२ ।। ‘इस समय मेरे प्राण अकुला रहे हैं। यह पृथ्वी काँपती-सी जान पड़ती है। इस समय मुझमें इतनी शक्ति नहीं है कि घोड़ोंकी रास सँभालूँ और चाबुक लेकर इन्हें हाँकूँ’ ।। १२ ।।
अर्जुन उवाच
मा भैषीः स्तम्भयात्मानं त्वयापि नरपुङ्गव । अत्यद्भुतानि कर्माणि कृतानि रणमूर्धनि ।। १३ ।। **अर्जुन बोले—**नरश्रेष्ठ! डरो मत। अपने-आपको सँभालो। तुमने भी युद्धके मुहानेपर बड़े अद्भुत पराक्रम दिखाये हैं ।। १३ ।।