भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2505

‘आज देख लेना, जैसे प्रबल वेगसे आयी हुई जलकी बाढ़ किनारोंको काट-काटकर

गिरा देती है, उसी प्रकार मैं कौरवदलके सैन्यसमूहोंको मार गिराऊँगा ।।

ध्वजवृक्षं पत्तितृणं रथसिंहगणायुतम् ।

वनमादीपयिष्यामि कुरूणामस्त्रतेजसा ।। २९ ।।

‘कौरवोंकी सेना एक जंगलके समान है, उसमें ध्वज ही वृक्ष हैं, पैदल सैनिक घास-

फूस हैं तथा रथ ही सिंहोंके स्थानमें हैं। मैं अपने अस्त्र-शस्त्ररूपी अग्निसे आज इस

कौरववनको जलाकर भस्म कर दूँगा ।। २९ ।।

तानहं रथनीडेभ्यः शरैः संनतपर्वभिः ।

यत्तान् सर्वानतिबलान् योत्स्यमानानवस्थितान् ।

एकः संकालयिष्यामि वज्रपाणिरिवासुरान् ।। ३० ।।

‘जैसे व्याध घोंसलेमें बैठे हुए पक्षियोंको भी मार गिराता है, उसी प्रकार मैं मुड़ी हुई

नोकवाले (तीखे) बाणोंसे मारकर उन सभी कौरववीरोंको रथोंकी बैठकोंसे नीचे गिरा दूँगा।

जैसे वज्रधारी इन्द्र अकेले ही समस्त असुरोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार मैं भी

अकेला ही यहाँ युद्धके लिये सावधान होकर खड़े हुए समस्त महाबली योद्धाओंका

भलीभाँति विनाश कर डालूँगा ।।

रौद्रं रुद्रादहं ह्यस्त्रं वारुणं वरुणादपि ।

अस्त्रमाग्नेयमग्नेश्च वायव्यं मातरिश्वनः ।

वज्रादीनि तथास्त्राणि शक्रादहमवाप्तवान् ।। ३१ ।।

‘मैंने भगवान् रुद्रसे रौद्रास्त्रकी, वरुणसे वारुणास्त्रकी, अग्निसे आग्नेयास्त्रकी और

वायु देवतासे वायव्यास्त्रकी शिक्षा प्राप्त की है। इसी प्रकार साक्षात् इन्द्रसे मैंने वज्र आदि

अस्त्र प्राप्त किये हैं ।। ३१ ।।

धार्तराष्ट्रवनं घोरं नरसिंहाभिरक्षितम् ।

अहमुत्पाटयिष्यामि वैराटे व्येतु ते भयम् ।। ३२ ।।

‘वीर मानवरूपी सिंहोंसे सुरक्षित इस भयंकर कौरववनको मैं अकेला ही उजाड़

डालूँगा, अतः विराटकुमार! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये’ ।। ३२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमाश्वासितस्तेन वैराटिः सव्यसाचिना ।

व्यवागाहद् रथानीकं भीमं भीष्माभिरक्षितम् ।। ३३ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! सव्यसाची अर्जुनके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर

विराटकुमार उत्तरने भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे सुरक्षित रथियोंकी भयंकर सेनामें प्रवेश

किया ।। ३३ ।।

तमायान्तं महाबाहुं जिगीषन्तं रणे कुरून् ।