महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2516, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंते ध्वजं पाण्डुपुत्रस्य समासाद्य पतत्रिणः । ज्वलन्तं कपिमाजघ्नुर्ध्वजाग्रनिलयांश्च तान् ॥ ७ ॥ उन बाणोंने पाण्डुनन्दन अर्जुनकी ध्वजाके समीप पहुँचकर वहाँ बैठे हुए तेजस्वी वानरको तथा ध्वजके अग्रभागमें निवास करनेवाले अन्य भूतोंको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७ ॥ ततो भल्लेन महता पृथुधारेण पाण्डवः । छत्रं चिच्छेद भीष्मस्य तूर्णं तदपतद् भुवि ॥ ८ ॥ तब पाण्डुकुमारने मोटी धारवाले विशाल भल्लके द्वारा भीष्मका छत्र काट दिया, जिससे वह तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ८ ॥ ध्वजं चैवास्य कौन्तेयः शरैरभ्यहनद् भृशम् । शीघ्रकृद् रथवाहांश्च तथोभौ पार्ष्णिसारथी ॥ ९ ॥ फिर कुन्तीनन्दनने शीघ्रता करते हुए उनकी ध्वजाको भी अपने बाणोंसे छेद डाला और रथके घोड़ों, पार्श्वरक्षकों तथा सारथिको भी बहुत घायल कर दिया ॥ ९ ॥ अमृष्यमाणस्तद् भीष्मो जानन्नपि स पाण्डवम् । दिव्येनास्त्रेण महता धनंजयमावाकिरत् ॥ १० ॥ भीष्मजी अपने सैनिकोंपर किये गये अर्जुनके उस पराक्रमको सह न सके। वे यह जानते हुए भी कि ये पाण्डुपुत्र धनंजय हैं, महान् दिव्यास्त्रद्वारा उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १० ॥ तथैव पाण्डवो भीष्मे दिव्यमस्त्रमुदीरयन् । प्रत्यगृह्णादमेयात्मा महामेघमिवाचलः ॥ ११ ॥ परंतु असीम आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डुपुत्र अर्जुन जैसे पर्वत महामेघका सामना करता है, उसी प्रकार भीष्मपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करते हुए उनका सामना करने लगे ॥ ११ ॥ तयोस्तदभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । भीष्मस्य सह पार्थेन बलिवासवयोरिव ॥ १२ ॥ उन दोनोंका वह तुमुल युद्ध रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। पार्थके साथ भीष्मका वह संग्राम बलि और इन्द्रके युद्धके समान था ॥ १२ ॥ प्रैक्षन्त कुरवः सर्वे योधाश्च सहसैनिकाः । भल्लैर्भल्लाः समागम्य भीष्मपाण्डवयोर्युधि । अन्तरिक्षे व्यराजन्त खद्योताः प्रावृषीव हि ॥ १३ ॥ समस्त कौरव-योद्धा अपने सैनिकोंके साथ खड़े-खड़े तमाशा देखने लगे। रणभूमिमें भीष्म और पाण्डुकुमारके भल्ल एक-दूसरेसे टकराकर वर्षाकालके आकाशमें जुगनुओंकी भाँति चमक उठते थे ॥ १३ ॥ अग्निचक्रमिवाविद्धं सव्यदक्षिणमस्यतः ।