भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2521, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2521

जनमेजय! चित्रसेनके ऐसा कहनेपर देवराज इन्द्रने दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करके अर्जुन और भीष्मके इस अद्भुत संग्रामके प्रति आदर प्रकट किया ॥ ४४ ॥ ततः शान्तनवो भीष्मो वामं पार्श्वमताडयत् । पश्यतः प्रतिसंधाय विध्यतः सव्यसाचिनः ॥ ४५ ॥ तदनन्तर शान्तनुनन्दन भीष्मने (कौरवसेनाको) घायल करनेवाले सव्यसाची अर्जुनके देखते-देखते बाणसंधान करके उनका बायाँ पार्श्व बींध डाला ॥ ४५ ॥ ततः प्रहस्य बीभत्सुः पृथुधारेण कार्मुकम् । चिच्छेद गार्ध्रपत्रेण भीष्मस्यादित्यतेजसः ॥ ४६ ॥ तब अर्जुनने भी हँसकर मोटी धार एवं गीधकी पाँखवाले बाणसे सूर्यके समान तेजस्वी भीष्मका धनुष फिर काट दिया ॥ ४६ ॥ अथैनं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । यतमानं पराक्रान्तं कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ ४७ ॥ तत्पश्चात् कुन्तीपुत्र धनंजयने विजयके लिये प्रयत्नशील पराक्रमी भीष्मकी छातीमें दस बाण मारकर गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४७ ॥

स पीडितो महाबाहुर्गृहीत्वा रथकूबरम् । गाङ्गेयो युद्धदुर्धर्षस्तस्थौ दीर्घमिवान्तरम् ॥ ४८ ॥