भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2526

बाणेन विद्धं रुधिरं वमन्तम् ॥ १४ ॥ उस समय दुर्योधनका रूप भयंकर हो रहा था। वह हार खाकर बाणसे घायल हो रक्त वमन करता हुआ भागा जा रहा था। यह देखकर शत्रु का वेग सहन करनेवाले किरीटधारी अर्जुनने ताल ठोंकी और मनमें युद्धके लिये उत्साह रखते हुए वे शत्रुको ललकारने लगे ॥ १४ ॥

अर्जुन उवाच

विहाय कीर्तिं विपुलं यशश्च युद्धात् परावृत्य पलायसे किम् । न तेऽद्य तूर्याणि समाहतानि तथैव राज्यादवरोपितस्य ॥ १५ ॥ युधिष्ठिरस्यास्मि निदेशकारी पार्थस्तृतीयो युधि संस्थितोऽस्मि । तदर्थमावृत्य मुखं प्रयच्छ नरेन्द्रवृत्तं स्मर धार्तराष्ट्र ॥ १६ ॥ **अर्जुन बोले—**धृतराष्ट्रके पुत्र! तू युद्धसे पीठ दिखाकर क्यों भागा जा रहा है? अरे! ऐसा करके तू अपनी कीर्ति और विशाल यशसे हाथ धो बैठा है। आज तेरे विजयके बाजे पहले-जैसे नहीं बज रहे हैं। तूने जिन्हें राज्यसे उतार दिया है, उन्हीं महाराज युधिष्ठिरका आज्ञाकारी मैं तीसरा पाण्डव युद्धके लिये खड़ा हूँ। अतः तू मेरा सामना करनेके लिये लौटकर अपना मुँह तो दिखा। राजाका आचार-व्यवहार कैसा होना चाहिये, इसकी याद तो कर ले ॥ १५-१६ ॥

मोघं तवेदं भुवि नामधेयं दुर्योधनेतीह कृतं पुरस्तात् । न हीह दुर्योधनता तवास्ति पलायमानस्य रणं विहाय ॥ १७ ॥ व्यर्थ ही इस पृथ्वीपर तेरा नाम दुर्योधन रखा गया। तू तो युद्ध छोड़कर भागा जा रहा है; अतः यहाँ तुझमें दुर्योधन नामके अनुरूप कोई गुण नहीं है ॥ १७ ॥

न ते पुरस्तादथ पृष्ठतो वा पश्यामि दुर्योधन रक्षितारम् । अपेहि युद्धात् पुरुषप्रवीर प्राणान् प्रियान् पाण्डवतोऽद्य रक्ष ॥ १८ ॥ दुर्योधन! अच्छा, तेरे आगे या पीछे कोई रक्षक नहीं दिखायी देता। अतः वीर पुरुष! तू युद्धसे भाग जा और पाण्डुपुत्र अर्जुनके हाथसे आज अपने प्यारे प्राणोंकी रक्षा कर