महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसी प्रकार अन्य माननीय वीरोंसे भी विदा ले गाण्डीवकी टंकारसे सम्पूर्ण जगत्को
प्रतिध्वनित करके वीर अर्जुनने सहसा देवदत्त नामक शंख बजाया और शत्रुओंका दिल
दहला दिया ।। २७१/२ ।।
ध्वजेन सर्वानभिभूय शत्रून्
सहेममालेन विराजमानः ।। २८ ।।
दृष्ट्वा प्रयातांस्तु कुरून् किरीटी
हृष्टोऽब्रवीत् तत्र स मत्स्यपुत्रम् ।
आवर्तयाश्वान् पशवो जितास्ते
याताः परे याहि पुरं प्रहृष्टः ।। २९ ।।
इस प्रकार अपने रथकी सुवर्णमालामण्डित ध्वजासे सम्पूर्ण शत्रुओंका तिरस्कार करके
अर्जुन विजयोल्लाससे विशेष शोभा पाने लगे। कौरव चले गये, यह देखकर किरीटधारी
अर्जुनको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मत्स्यनरेशके पुत्र उत्तरसे वहाँ इस प्रकार कहा
—'राजकुमार! अब घोड़ोंको लौटाओ। तुम्हारी गौओंको जीत लिया गया और शत्रु भाग
गये; इसलिये अब तुम आनन्दपूर्वक नगरकी ओर चलो' ।। २८-२९ ।।
देवास्तु दृष्ट्वा महदद्भुतं तद्
युद्धं कुरूणां सह फाल्गुनेन ।
जग्मुर्यथास्वं भवनं प्रतीताः
पार्थस्य कर्माणि विचिन्तयन्तः ।। ३० ।।
अर्जुनके साथ होनेवाला कौरवोंका वह अत्यन्त अद्भुत युद्ध देखकर देवतालोग बड़े
प्रसन्न हुए और अर्जुनके पराक्रमका स्मरण करते हुए अपने-अपने भवनको चले
गये ।। ३० ।।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि समस्तकौरवपलायने
षट्षष्टितमोऽध्यायः ।। ६६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें समस्त कौरवोंके पलायनसे
सम्बन्ध रखनेवाला छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६६ ।।