भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2538

मत्स्यराज डरकर प्राण त्याग देंगे ॥ ९ ॥ मया जिता सा ध्वजिनी कुरूणां मया च गावो विजिता द्विषद्भ्यः। पितुः सकाशं नगरं प्रविश्य त्वमात्मनः कर्म कृतं ब्रवीहि ॥ १० ॥ 'राजधानीमें प्रवेश करके पिताके समीप जानेपर तुम यही कहना कि मैंने कौरवोंकी उस विशाल सेनापर विजय पायी है और मैंने ही शत्रुओंसे अपनी गौओंको जीता है। सारांश यह कि युद्धमें जो कुछ हुआ है, वह सब तुम अपना ही किया हुआ पराक्रम बताना' ॥ १० ॥

उत्तर उवाच

यत् ते कृतं कर्म न पारणीयं तत् ते कर्म कर्तुं मम नास्ति शक्तिः। न त्वां प्रवक्ष्यामि पितुः सकाशे यावन्न मां वक्ष्यसि सव्यसाचिन् ॥ ११ ॥ **उत्तरने कहा—**सव्यसाचिन्! आपने जो पराक्रम किया है, वह दूसरेके लिये असम्भव है। वैसा अद्भुत कर्म करनेकी मुझमें शक्ति नहीं है; तथापि जबतक आप मुझे आज्ञा न देंगे, तबतक पिताजीके निकट आपके विषयमें मैं कुछ भी नहीं कहूँगा ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

स शत्रुसेनांमवजित्य जिष्णु- राच्छिद्य सर्वं च धनं कुरुभ्यः। श्मशानमागत्य पुनः शमीं ता- मभ्येत्य तस्थौ शरविक्षताङ्गः ॥ १२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! विजयशील अर्जुन पूर्वोक्तरूपसे शत्रुसेनाको परास्त करके कौरवोंके हाथसे सारा गोधन छीन लेनेके बाद पुनः श्मशानभूमिमें उसी शमीवृक्षके समीप आकर खड़े हुए। उस समय उनके सभी अंग बाणोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो रहे थे ॥

ततः स वह्निप्रतिमो महाकपिः सहैव भूतैर्दिवमुत्पपात। तथैव माया विहिता बभूव ध्वजं च सैंहं युयुजे रथे पुनः ॥ १३ ॥ तदनन्तर वह अग्निके समान तेजस्वी महावानर ध्वजनिवासी भूतगणोंके साथ आकाशमें उड़ गया। उसी प्रकार ध्वजसहित वह दैवी माया भी विलीन हो गयी और