भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2550, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2550

अथोत्तरः शुभैर्गन्धैर्माल्यैश्च विविधैस्तथा । अवकीर्यमाणः संहृष्टो नगरं स्वैरमागतः ॥ ५० ॥ इसी समय राजकुमार उत्तर बड़े हर्षके साथ स्वच्छन्दतापूर्वक नगरमें आये। मार्गमें उनके ऊपर उत्तम गन्ध और भाँति-भाँतिके पुष्पहार बरसाये जा रहे थे ।। सभाज्यमानः पौरैश्च स्त्रीभिर्जानपदैस्तथा । आसाद्य भवनद्वारं पित्रे सम्प्रत्यवेदयत् ॥ ५१ ॥ मत्स्यदेशके लोगों, पुरवासियों तथा सुन्दरी स्त्रियोंने उनका स्वागत किया; फिर राजभवनके द्वारपर पहुँचकर उन्होंने पिताको अपने आगमनकी सूचना करवायी ।। ५१ ।। ततो द्वाःस्थः प्रविश्यैव विराटमिदमब्रवीत् । बृहन्नलासहायश्च पुत्रो द्वार्युत्तरः स्थितः ॥ ५२ ॥ तब द्वारपालने भीतर जाकर महाराज विराटसे कहा—'प्रभो! बृहन्नलाके साथ राजकुमार उत्तर द्वारपर खड़े हैं' ।। ५२ ।। ततो हृष्टो मत्स्यराजः क्षत्तारमिदमब्रवीत् । प्रवेश्यतामुभौ तूर्णं दर्शनेप्सुरहं तयोः ॥ ५३ ॥ इस समाचारसे प्रसन्न होकर मत्स्यराज अपने सेवकसे बोले—'मैं उन दोनोंसे मिलना चाहता हूँ; अतः उन्हें शीघ्र भीतर ले आओ' ।। ५३ ।। क्षत्तारं कुरुराजस्तु शनैः कर्ण उपाजपत् ।

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