महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2556, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस निवृत्तो नरव्याघ्रो मुञ्चन् वज्रनिभाञ्छरान् । सचिवैः संवृतो राजा रथे नाग इव श्वसन् ॥ ८ ॥ महाराज! इतना सुनना था कि नरश्रेष्ठ दुर्योधन साँपकी भाँति फुँफकारता हुआ रथके द्वारा लौट आया और मन्त्रियोंसे घिरकर उस देवपुत्रपर वज्र-सरीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ८ ॥
तं दृष्ट्वा रोमहर्षोऽभूदूरुकम्पश्च मारिष । स तत्र सिंहसंकाशमनीकं व्यधमच्छरैः ॥ ९ ॥ मारिष! उस समय उसे देखकर मेरे तो रोंगटे खड़े हो गये और जाँघें काँपने लगीं; किंतु उस देवपुत्रने अपने बाणोंद्वारा सिंहके समान पराक्रमी दुर्योधन और उसकी सेनाको संतप्त कर दिया ॥ ९ ॥
तत् प्रणुद्य रथानीकं सिंहसंहननो युवा । कुरूंस्तान् प्रहसन् राजन् संस्थितान् हृतवाससः ॥ १० ॥ एकेन तेन वीरेण षड् रथाः परिनिर्जिताः । शार्दूलेनेव मत्तेन यथा वनचरा मृगाः ॥ ११ ॥ सिंहके समान सुदृढ़ शरीरवाले उस तरुण वीरने रथाारोहियोंकी सेनाको छिन्न-भिन्न करके हँसते-हँसते उन कौरवोंको भी धराशायी कर दिया, जिससे उनके कपड़े उतार लिये गये। जैसे मदोन्मत्त सिंह वनमें विचरनेवाले मृगोंको परास्त करता है, उसी प्रकार उस वीर देवपुत्रने अकेले ही उन छः महारथियोंको हराया है ॥ १०-११ ॥
विराट उवाच
क्व स वीरो महाबाहुर्देवपुत्रो महायशाः । यो मे धनमथाजैषीत् कुरुभिर्ग्रस्तमाहवे ॥ १२ ॥ इच्छामि तमहं द्रष्टुमर्चितुं च महाबलम् । येन मे त्वं च गावश्च रक्षिता देवसूनुना ॥ १३ ॥ विराटने पूछा—बेटा! वह महायशस्वी महाबाहु वीर देवपुत्र कहाँ है, जिसने युद्धमें कौरवोंद्वारा काबूमें की हुई मेरी गौओंको जीता है? जिस देवकुमारने तुम्हें और मेरी गौओंको भी बचाया है, मैं उस महापराक्रमी वीरको देखना और उसका सत्कार करना चाहता हूँ ॥ १२-१३ ॥
उत्तर उवाच
अन्तर्धानं गतस्तत्र देवपुत्रो महाबलः । स तु श्वो वा परश्वो वा मन्ये प्रादुर्भविष्यति ॥ १४ ॥ उत्तरने कहा—पिताजी! वह महाबली देवपुत्र वहीं अन्तर्धान हो गया; किंतु मेरा विश्वास है कि वह कल या परसों यहाँ फिर प्रकट होगा ॥ १४ ॥