महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2568, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर उन्होंने युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेवका बार-बार मस्तक सूँघा और सबको हृदयसे लगाया ।। ३० ।।
नातृप्यद् दर्शने तेषां विराटो वाहिनीपतिः ।
स प्रीयमाणो राजानं युधिष्ठिरमथाब्रवीत् ।। ३१ ।।
सेनाओंके स्वामी राजा विराट पाण्डवोंको देख-देखकर तृप्त नहीं होते थे। वे प्रेमपूर्वक राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ।। ३१ ।।
दिष्ट्या भवन्तः सम्प्राप्ताः सर्वे कुशलिनो वनात् ।
दिष्ट्या सम्पालितं कृच्छ्रमज्ञातं वै दुरात्मभिः ।। ३२ ।।
‘बड़े सौभाग्यकी बात है, जो आप सब लोग वनसे कुशलपूर्वक लौट आये। दुरात्मा कौरवोंसे अज्ञात रहकर आपने यह कष्टसाध्य अज्ञातवासका नियम पूरा कर लिया, यह भी बड़े आनन्दकी बात है ।। ३२ ।।
इदं च राज्यं पार्थाय यच्चान्यदपि किञ्चन ।
प्रतिगृह्णन्तु तत् सर्वं पाण्डवा अविशङ्कया ।। ३३ ।।
‘मेरा यह राज्य कुन्तीपुत्रको समर्पित है। इसके सिवा और भी जो कुछ मेरे पास है, वह सब पाण्डवलोग बिना किसी संकोचके ग्रहण करें ।। ३३ ।।
उत्तरां प्रतिगृह्णातु सव्यसाची धनंजयः ।
अयं ह्यौपयिको भर्ता तस्याः पुरुषसत्तमः ।। ३४ ।।
‘सव्यसाची धनंजय मेरी कन्या उत्तराको पत्नीरूपमें स्वीकार करें। ये नरश्रेष्ठ उसके लिये सर्वथा योग्य पति हैं’ ।। ३४ ।।
एवमुक्तो धर्मराजः पार्थमैक्षद् धनंजयम् ।
ईक्षितश्चार्जुनो भ्रात्रा मत्स्यं वचनमब्रवीत् ।। ३५ ।।
प्रतिगृह्णाम्यहं राजन् स्नुषां दुहितरं तव ।
युक्तश्चावां हि सम्बन्धो मत्स्यभारतयोरपि ।। ३६ ।।
राजा विराटके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने कुन्तीनन्दन अर्जुनकी ओर देखा। भाईके देखनेपर अर्जुनने मत्स्यराजसे इस प्रकार कहा—‘राजन्! मैं आपकी पुत्रीको अपनी पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करता हूँ। मत्स्य और भरतवंशका यह सम्बन्ध सर्वथा उचित है’ ।। ३५-३६ ।।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि उत्तराविवाहप्रस्तावे
एकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें उत्तराविवाहप्रस्तावविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३७ श्लोक हैं।)