महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस क्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेदं शिथिलं मनः। वीर्यमास्थाय कौरव्य धुरमुद्वह धुर्यवत्॥ ५७॥ ‘कुरुनन्दन! अपने हृदयको क्षत्रियोचित उत्साहसे भरकर मनकी इस शिथिलताको दूर करके पराक्रमका आश्रय ले आप एक धुरन्धर वीर पुरुषकी भाँति युद्धका भार वहन कीजिये॥ ५७॥
न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन। पार्थिवो व्यजयद् राजन् न भूतिं न पुनः श्रियम्॥ ५८॥ ‘महाराज! केवल धर्ममें ही लगे रहनेवाले किसी भी नरेशने आजतक न तो कभी पृथ्वीपर विजय पायी है और न ऐश्वर्य तथा लक्ष्मीको ही प्राप्त किया है॥ ५८॥
जिह्वां दत्त्वा बहूनां हि क्षुद्राणां लुब्धचेतसाम्। निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यकः॥ ५९॥ ‘जैसे बहेलिया लुब्ध हृदयवाले छोटे-छोटे मृगोंको कुछ खानेकी वस्तुओंका लोभ देकर छलसे उन्हें पकड़ लेता है, उसी प्रकार नीतिज्ञ राजा शत्रुओंके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करके उनसे राज्यको प्राप्त कर लेता है॥ ५९॥
भ्रातरः पूर्वजाताश्च सुसमृद्धाश्च सर्वशः। निकृत्या निर्जिता देवैरसुराः पार्थिवर्षभ॥ ६०॥ ‘नृपश्रेष्ठ! आप जानते हैं कि असुरगण देवताओंके बड़े भाई हैं, उनसे पहले उत्पन्न हुए हैं और सब प्रकारसे समृद्धिशाली हैं तो भी देवताओंने छलसे उन्हें जीत लिया॥ ६०॥
एवं बलवतः सर्वमिति बुद्ध्वा महीपते। जहि शत्रून् महाबाहो परां निकृतिमास्थितः॥ ६१॥ ‘महाराज! महाबाहो! इस प्रकार बलवान्का ही सबपर अधिकार होता है, यह समझकर आप भी कूटनीतिका आश्रय ले अपने शत्रुओंको मार डालिये॥ ६१॥
न ह्यर्जुनसमः कश्चिद् युधि योद्धा धनुर्धरः। भविता वा पुमान् कश्चिन्मत्समो वा गदाधरः॥ ६२॥ ‘युद्धमें अर्जुनके समान कोई धनुर्धर अथवा मेरे समान गदाधारी योद्धा न तो है और न आगे होनेकी ही सम्भावना है॥ ६२॥
सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन् सुबलवानपि। अप्रमादी महोत्साही सत्त्वस्थो भव पाण्डव॥ ६३॥ ‘पाण्डुनन्दन! अत्यन्त बलवान् पुरुष भी आत्मबलसे ही युद्ध करता है, इसलिये आप सावधानीपूर्वक महान् उत्साह और आत्मबलका आश्रय लीजिये॥ ६३॥
सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा। न तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छायेव हैमनी॥ ६४॥