भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

यथाकामं विदितमजातशत्रो । अथापरं चाविदितं चरेथाः सर्वैः सह भ्रातृभिश्च्छन्नगूढः ॥ ९ ॥ ‘राजकुमार अजातशत्रो! (यदि आप हार जायें तो) आपको बारह वर्षोंतक इच्छानुसार सबकी जानकारीमें और पुनः एक वर्षतक गुप्त वेषमें छिपे रहकर अपने भाइयोंके साथ वनमें निवास करना पड़ेगा ॥ ९ ॥

त्वां चेच्छ्रुत्वा तात तथा चरन्त- मवभोत्स्यन्ते भरतानां चराश्च । अन्यांश्चरेथास्तावतोऽब्दांस्तथा त्वं निश्चित्य तत् प्रतिजानीहि पार्थ ॥ १० ॥ ‘कुन्तीकुमार! यदि भरतवंशियोंके गुप्तचर आपके गुप्त निवासका समाचार सुनकर पता लगाने लगें और उन्हें यह मालूम हो जाय कि आपलोग अमुक जगह अमुक रूपमें रह रहे हैं, तब आपको पुनः उतने (बारह) ही वर्षोंतक वनमें रहना पड़ेगा। इस बातको निश्चय करके इसके विषयमें प्रतिज्ञा कीजिये ॥ १० ॥

चरेश्चेन्नोऽविदितः कालमेतं युक्तो राजन् मोहयित्वा मदीयान् । ब्रवीमि सत्यं कुरुसंसदीह तवैव ता भारत पञ्च नद्यः ॥ ११ ॥ ‘भरतवंशी नरेश! यदि आप सावधान रहकर इतने समयतक मेरे गुप्तचरोंको मोहित करके अज्ञात-भावसे ही विचरते रहें तो मैं यहाँ कौरवोंकी सभामें यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि उस सारे पंचनदप्रदेशपर फिर तुम्हारा ही अधिकार होगा ॥ ११ ॥

वयं चैतद् भारत सर्व एव त्वया जिताः कालमपास्य भोगान् । वसेम इत्याह पुरा स राजा मध्ये कुरूणां स मयोक्तस्तथेति ॥ १२ ॥ ‘भारत! यदि आपने ही हम सब लोगोंको जीत लिया तो हम भी उतने ही समयतक सारे भोगोंका परित्याग करके उसी प्रकार वास करेंगे।' राजा दुर्योधनने जब समस्त कौरवोंके बीच इस प्रकार कहा, तब मैंने भी 'तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली ॥ १२ ॥

तत्र द्यूतमभवन्नो जघन्यं तस्मिञ्जिताः प्रव्रजिताश्च सर्वे । इत्थं तु देशाननुसंचरामो वनानि कृच्छ्राणि च कृच्छ्ररूपाः ॥ १३ ॥