महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूयोऽपि दुःखं मम भीमसेन दूये विषस्येव रसं हि पीत्वा । यद् याज्ञसेनीं परिक्लिश्यमानां संदृश्य तत् क्षान्तमिति स्म भीम ॥ १८ ॥ भीमसेन! मुझे इस बातका भी बड़ा दुःख है कि द्रौपदीको शत्रुओंद्वारा क्लेश दिया जा रहा था और हमने अपनी आँखों देखकर भी उसे चुपचाप सह लिया। जैसे कोई विष घोलकर पी ले और उसकी पीड़ासे कराहने लगे, वैसी ही वेदना इस समय मुझे हो रही है ॥ १८ ॥
न त्वद्य शक्यं भरतप्रवीर कृत्वा यदुक्तं कुरुवीरमध्ये । कालं प्रतीक्षस्व सुखोदयस्य पक्तिं फलानाभिव बीजवापः ॥ १९ ॥ भरतवंशके प्रमुख वीर! कौरव वीरोंके बीच मैंने जो प्रतिज्ञा की है, उसे स्वीकार कर लेनेके बाद अब इस समय आक्रमण नहीं किया जा सकता। जैसे बीज बोनेवाला किसान अपनी खेतीके फलोंके पकनेकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार तुम भी उस समयकी प्रतीक्षा करो, जो हमारे लिये सुखकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ १९ ॥
यदा हि पूर्वं निकृतो निकृन्तेद् वैरं सपुष्पं सफलं विदित्वा । महागुणं हरति हि पौरुषेण तदा वीरो जीवति जीवलोके ॥ २० ॥ जब पहले शत्रुके द्वारा धोखा खाया हुआ वीर पुरुष उसे फूलता-फलता जानकर अपने पुरुषार्थके द्वारा उसका मूलोच्छेद कर डालता है, तभी उस शत्रुके महान् गुणोंका अपहरण कर लेता है और इस जगत्में सुखपूर्वक जीवित रहता है ॥ २० ॥
श्रियं च लोके लभते समग्रां मन्ये चास्मै शत्रवः संनमन्ते । मित्राणि चैनमचिराद् भजन्ते देवा इवेन्द्रमुपजीवन्ति चैनम् ॥ २१ ॥ वह वीर पुरुष लोकमें सम्पूर्ण लक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है। मैं यह भी मानता हूँ कि सभी शत्रु उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं। फिर थोड़े ही दिनोंमें उसके बहुत-से मित्र बन जाते हैं और जैसे देवता इन्द्रके सहारे जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार वे मित्रगण उस वीरकी छत्रछायामें रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ २१ ॥
मम प्रतिज्ञां च निबोध सत्यां वृणे धर्मममृताज्जीविताच्च ।