महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 275, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमां चापि राजञ्जानन्ति ह्याकुमारमिमाः प्रजाः ॥ २८ ॥ नाज्ञातचर्यां पश्यामि मेरोरिव निगूहनम् । महाराज! मुझे भी प्रजावर्गके बच्चेतक पहचानते हैं, जैसे मेरुपर्वतको छिपाना असम्भव है, उसी प्रकार मुझे अपनी अज्ञातचर्या भी सम्भव नहीं दिखायी देती ॥ २८ १/२ ॥ तथैव बहवोऽस्माभी राष्ट्रेभ्यो विप्रवासिताः ॥ २९ ॥ राजानो राजपुत्राश्च धृतराष्ट्रमनुव्रताः । न हि तेऽप्युपशाम्यन्ति निकृता वा निराकृताः ॥ ३० ॥ राजन्! इसके सिवा एक बात और है, हमलोगोंने भी बहुत-से राजाओं तथा राजकुमारोंको उनके राज्यसे निकाल दिया है। वे सब आकर राजा धृतराष्ट्रसे मिल गये होंगे, हमने जिनको राज्यसे वंचित किया अथवा निकाला है, वे कदापि हमारे प्रति शान्तभाव नहीं धारण कर सकते ॥ २९-३० ॥ अवश्यं तैर्निकर्तव्यमस्माकं तत्प्रियैषिभिः । तेऽप्यस्मासु प्रयुञ्जीरन् प्रच्छन्नान् सुबहूञ्छरान् । आचक्षीरंश्च नो ज्ञात्वा ततः स्यात् सुमहद् भयम् ॥ ३१ ॥ अवश्य ही दुर्योधनका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर वे राजालोग भी हमलोगोंको धोखा देना उचित समझकर हमलोगोंकी खोज करनेके लिये बहुत-से छिपे हुए गुप्तचर नियुक्त करेंगे और पता लग जानेपर निश्चय ही दुर्योधनको सूचित कर देंगे। उस दशामें हमलोगोंपर बड़ा भारी भय उपस्थित हो जायगा ॥ ३१ ॥ अस्माभिरुषिताः सम्यग्वने मासास्त्रयोदश । परिमाणेन तान् पश्य तावतः परिवत्सरान् ॥ ३२ ॥ हमने अबतक वनमें ठीक-ठीक तेरह महीने व्यतीत कर लिये हैं, आप इन्हींको परिमाणमें तेरह वर्ष समझ लीजिये ॥ ३२ ॥ अस्ति मासः प्रतिनिधिर्यथा प्राहुर्मनीषिणः । पूतिकामिव सोमस्य तथेदं क्रियतामिति ॥ ३३ ॥ मनीषी पुरुषोंका कहना है कि मास संवत्सरका प्रतिनिधि है। जैसे पूतिका सोमलताके स्थानपर यज्ञमें काम देती है, उसी प्रकार आप इन तेरह मासोंको ही तेरह वर्षोंका प्रतिनिधि स्वीकार कर लीजिये ॥ ३३ ॥ अथवानडुहे राजन् साधवे साधुवाहिने । सौहित्यदानादेतस्मादेनसः प्रतिमुच्यते ॥ ३४ ॥ राजन्! अथवा अच्छी तरह बोझ ढोनेवाले उत्तम बैलको भरपेट भोजन दे देनेपर इस पापसे आपको छुटकारा मिल सकता है ॥ ३४ ॥ तस्माच्छत्रुवधे राजन् क्रियतां निश्चयस्त्वया । क्षत्रियस्य हि सर्वस्य नान्यो धर्मोऽस्ति संयुगात् ॥ ३५ ॥