महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 282, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमुक्त्वा प्रपन्नाय शुचये भगवान् प्रभुः । प्रोवाच लोकतत्त्वज्ञो योगी विद्यामनुत्तमाम् ॥ ३८ ॥ धर्मराजाय धीमान् स व्यासः सत्यवतीसुतः । अनुज्ञाय च कौन्तेयं तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर लोकतत्त्वके ज्ञाता एवं शक्तिशाली योगी परम बुद्धिमान् सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यासजीने अपनी शरणमें आये हुए पवित्र धर्मराज युधिष्ठिरको उस अत्युत्तम विद्याका उपदेश किया और कुन्तीकुमारकी अनुमति लेकर फिर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ३८-३९ ॥ युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा तद् ब्रह्म मनसा यतः । धारयामास मेधावी काले काले सदाभ्यसन् ॥ ४० ॥ धर्मात्मा मेधावी संयतचित्त युधिष्ठिरने उस वेदोक्त मन्त्रको मनसे धारण किया और समय-समयपर सदा उसका अभ्यास करने लगे ॥ ४० ॥ स व्यासवाक्यमुदितो वनाद् द्वैतवनात् ततः । ययौ सरस्वतीकूले काम्यकं नाम काननम् ॥ ४१ ॥ तदनन्तर वे व्यासजीकी आज्ञासे प्रसन्नतापूर्वक द्वैतवनसे काम्यकवनमें चले गये, जो सरस्वतीके तटपर सुशोभित है ॥ ४१ ॥ तमन्वयुर्महाराज शिक्षाक्षरविशारदाः । ब्राह्मणास्तपसा युक्ता देवेन्द्रमृषयो यथा ॥ ४२ ॥ महाराज! जैसे महर्षिगण देवराज इन्द्रका अनुसरण करते हैं, वैसे ही वेदादि शास्त्रोंकी शिक्षा तथा अक्षर ब्रह्मतत्त्वके ज्ञानमें निपुण बहुत-से तपस्वी ब्राह्मण राजा युधिष्ठिरके साथ उस वनमें गये ॥ ४२ ॥ ततः काम्यकमासाद्य पुनस्ते भरतर्षभ । न्यविशन्त महात्मानः सामात्याः सपरिच्छदाः ॥ ४३ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँसे काम्यकवनमें आकर मन्त्रियों और सेवकोंसहित वे महात्मा पाण्डव पुनः वहीं बस गये ॥ ४३ ॥ तत्र ते न्यवसन् राजन् किंचित् कालं मनस्विनः । धनुर्वेदपरा वीराः शृण्वन्तो वेदमुत्तमम् ॥ ४४ ॥ राजन्! वहाँ धनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर हो उत्तम वेदमन्त्रोंका उद्घोष सुनते हुए उन मनस्वी पाण्डवोंने कुछ कालतक निवास किया ॥ ४४ ॥ चरन्तो मृगयां नित्यं शुद्धैर्बाणैर्मृगार्थिनः । पितृदैवतविप्रेभ्यो निर्वपन्तो यथाविधि ॥ ४५ ॥ वे प्रतिदिन हिंसक पशुओंको मारनेके लिये शुद्ध (शास्त्रानुकूल) बाणोंद्वारा शिकार खेलते थे एवं शास्त्रकी विधिके अनुसार नित्य पितरों तथा देवताओंको अपना-अपना भाग