महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 284, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तत्रिंशोऽध्यायः
अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । संस्मृत्य मुनिसंदेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥ विविक्ते विदितप्रज्ञमर्जुनं पुरुषर्षभ । सान्त्वपूर्वं स्मितं कृत्वा पाणिना परिसंस्पृशन् ॥ २ ॥ स मुहूर्तमेव ध्यात्वा वनवासमरिंदमः । धनंजयं धर्मराजो रहसीदमुवाच ह ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— नरश्रेष्ठ जनमेजय! कुछ कालके अनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरको व्यासजीके संदेशका स्मरण हो आया। तब उन्होंने परम बुद्धिमान् अर्जुनसे एकान्तमें वार्तालाप किया। शत्रुओंका दमन करनेवाले धर्मराज युधिष्ठिरने दो घड़ीतक वनवासके विषयमें चिन्तन करके किंचित् मुसकराते हुए अर्जुनके शरीरको हाथसे स्पर्श किया और एकान्तमें उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ॥ १—३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे द्रोणपुत्रे च भारत । धनुर्वेदश्चतुष्पाद एतेष्वद्य प्रतिष्ठितः ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरने कहा— भारत! आजकल पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण और अश्वत्थामा—इन सबमें चारों पादोंसे युक्त सम्पूर्ण धनुर्वेद प्रतिष्ठित है ॥ ४ ॥
दैवं ब्राह्मं मानुषं च सयत्नं सचिकित्सितम् । सर्वास्त्राणां प्रयोगं च अभिजानन्ति कृत्स्नशः ॥ ५ ॥
वे दैव, ब्राह्म और मानुष तीनों पद्धतियोंके अनुसार सम्पूर्ण अस्त्रोंके प्रयोगकी सारी कलाएँ जानते हैं। उन अस्त्रोंके ग्रहण और धारणरूप प्रयत्नसे तो वे परिचित हैं ही, शत्रुओंद्धारा प्रयुक्त हुए अस्त्रोंकी चिकित्सा (निवारणके उपाय)-को भी जानते हैं ॥ ५ ॥
ते सर्वे धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण परिसान्त्विताः । संविभक्ताश्च तुष्टाश्च गुरुवत् तेषु वर्तते ॥ ६ ॥
उन सबको धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने बड़े आश्वासनके साथ रखा है और उपभोगकी सामग्री देकर संतुष्ट किया है। इतना ही नहीं, वह उनके प्रति गुरुजनोचित बर्ताव करता है ॥ ६ ॥