महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके बड़ी उतावलीके साथ जाते हुए वे अकेले ही एक भयंकर कण्टकाकीर्ण वनमें पहुँचे ॥ १४ ॥ नानापुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् । नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥ १५ ॥ जो नाना प्रकारके फल-फूलोंसे भरा था, भाँति-भाँतिके पक्षी जहाँ कलरव कर रहे थे, अनेक जातियोंके मृग उस वनमें सब ओर विचरते रहते थे तथा कितने ही सिद्ध और चारण निवास कर रहे थे ॥ १५ ॥ ततः प्रयाते कौन्तेये वनं मानुषवर्जितम् । शङ्खानां पटहानां च शब्दः समभवद् दिवि ॥ १६ ॥ तदनन्तर कुन्तीनन्दन अर्जुनके उस निर्जन वनमें पहुँचते ही आकाशमें शंखों और नगाड़ोंका गम्भीर घोष गूँज उठा ॥ १६ ॥ पुष्पवर्षं च सुमहन्निपपात महीतले । मेघजालं च विततं छादयामास सर्वतः ॥ १७ ॥ सोऽतीत्य वनदुर्गाणि संनिकर्षे महागिरेः । शुशुभे हिमवत्पृष्ठे वसमानोऽर्जुनस्तदा ॥ १८ ॥ पृथ्वीपर फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी। मेघोंकी घटा घिरकर आकाशमें सब ओर छा गयी। उन दुर्गम वनस्थलियोंको लाँघकर अर्जुन हिमालयके पृष्ठभागमें एक महान् पर्वतके निकट निवास करते हुए शोभा पाने लगे ॥ १७-१८ ॥ तत्रापश्यद् द्रुमान् फुल्लान् विहगैर्वल्गुनादितान् । नदीश्च विपुलावर्ता वैदूर्यविमलप्रभाः ॥ १९ ॥ वहाँ उन्होंने फूलोंसे सुशोभित बहुत-से वृक्ष देखे, जो पक्षियोंके मधुर शब्दसे गुंजायमान हो रहे थे। उन्होंने वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ जलसे भरी हुई शोभामयी कितनी ही नदियाँ देखीं, जिनमें बहुत-सी भँवरें उठ रही थीं ॥ १९ ॥ हंसकारण्डवोद्गीताः सारसाभिरुतास्तथा । पुंस्कोकिलरुताश्चैव क्रौञ्चबर्हिणनादिताः ॥ २० ॥ हंस, कारण्डव तथा सारस आदि पक्षी वहाँ मीठी बोली बोलते थे। तटवर्ती वृक्षोंपर कोयल मनोहर शब्द बोल रही थी। क्रौंचके कलरव और मयूरोंकी केकाध्वनि भी वहाँ सब ओर गूँजती रहती थी ॥ २० ॥ मनोहरवनोपेतास्तस्मिन्नतिरथोऽर्जुनः । पुण्यशीतामलजलाः पश्यन् प्रीतमनाभवत् ॥ २१ ॥ उन नदियोंके आस-पास मनोहर वनश्रेणी सुशोभित होती थी। हिमालयके उस शिखरपर पवित्र, शीतल और निर्मल जलसे भरी हुई उन सुन्दर सरिताओंका दर्शन करके अतिरथी अर्जुनका मन प्रसन्नतासे खिल उठा ॥ २१ ॥