महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ
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न मे स्यादपराधोऽयं महादेवातिसाहसात् । कृतो मयायमज्ञानाद् विमर्दो यस्त्वया सह । शरणं प्रतिपन्नाय तत् क्षमस्वाद्य शंकर ॥ ८२ ॥ महादेव! अत्यन्त साहसवश मैंने जो आपके साथ यह युद्ध किया है, इसमें मेरा अपराध नहीं है। यह अनजानमें मुझसे बन गया है। शंकर! मैं अब आपकी शरणमें आया हूँ। आप मेरी उस धृष्टताको क्षमा करें ।।
वैशम्पायन उवाच
तमुवाच महातेजाः प्रहस्य वृषभध्वजः । प्रगृह्य रुचिरं बाहुं क्षान्तमित्येव फाल्गुनम् ॥ ८३ ॥ **वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय! तब महातेजस्वी भगवान् वृषभध्वजने अर्जुनका सुन्दर हाथ पकड़कर उनसे हँसते हुए कहा—'मैंने तुम्हारा अपराध पहलेसे ही क्षमा कर दिया' ।। ८३ ।।
परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रीतात्मा भगवान् हरः । पुनः पार्थं सान्त्वपूर्वमुवाच वृषभध्वजः ॥ ८४ ॥