महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान
देवदेव उवाच
नरस्त्वं पूर्वदेहे वै नारायणसहायवान् ।
बदर्यां तप्तवानुग्रं तपो वर्षायुतान् बहून् ॥ १ ॥
देवदेव महादेवजी बोले— अर्जुन! तुम पूर्व-शरीरमें 'नर' नामक सुप्रसिद्ध ऋषि थे। नारायण तुम्हारे सखा हैं। तुमने बदरिकाश्रममें अनेक सहस्र वर्षोंतक उग्र तपस्या की है ॥ १ ॥
त्वयि वा परमं तेजो विष्णौ वा पुरुषोत्तमे ।
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तेजसा धार्यते जगत् ॥ २ ॥
तुममें अथवा पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुमें उत्कृष्ट तेज है। तुम दोनों पुरुषरत्नोंने अपने तेजसे इस सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रखा है ॥ २ ॥
शक्राभिषेके सुमहद्धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
प्रगृह्य दानवाः शस्तास्त्वया कृष्णेन च प्रभो ॥ ३ ॥
प्रभो! तुमने और श्रीकृष्णने इन्द्रके अभिषेकके समय मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले महान् धनुषको हाथमें लेकर बहुत-से दानवोंका वध किया था ॥ ३ ॥
तदेतदेव गाण्डीवं तव पार्थ करोचितम् ।
मायामास्थाय यद् ग्रस्तं मया पुरुषसत्तम ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर पार्थ! तुम्हारे हाथमें रहनेयोग्य यही वह गाण्डीव धनुष है, जिसे मैंने मायाका आश्रय लेकर अपनेमें विलीन कर लिया था ॥ ४ ॥
तूणौ चाप्यक्षयौ भूयस्तव पार्थ यथोचितौ ।
भविष्यति शरीरं च नीरुजं कुरुनन्दन ॥ ५ ॥
कुरुनन्दन! और ये रहे तुम्हारे दोनों अक्षय तूणीर, जो सर्वथा तुम्हारे ही योग्य हैं। कुन्तीकुमार! तुम्हारे शरीरमें जो चोट पहुँची है, वह सब दूर होकर तुम नीरोग हो जाओगे ॥ ५ ॥
प्रीतिमानस्मि ते पार्थ भवान् सत्यपराक्रमः ।
गृहाण वरमस्मतः काङ्क्षितं पुरुषोत्तम ॥ ६ ॥
पार्थ! तुम्हारा पराक्रम यथार्थ है, इसलिये मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। पुरुषोत्तम! तुम मुझसे मनोवांछित वर ग्रहण करो ॥ ६ ॥