महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 316, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब भगवान् शिवने रहस्य और उपसंहारसहित पाशुपतास्त्रका उन्हें उपदेश दिया। उस समय वह अस्त्र जैसे पहले त्रिनेत्रधारी उमापति शिवकी सेवामें उपस्थित हुआ था, उसी प्रकार मूर्तिमान् यमराजतुल्य पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनके पास आ गया। तब अर्जुनने बहुत प्रसन्न होकर उसे ग्रहण किया ॥ २०-२१ ॥
ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ।
ससागरवनोद्देशा सग्रामनगराकरा ॥ २२ ॥
अर्जुनके पाशुपतास्त्र ग्रहण करते ही पर्वत, वन, वृक्ष, समुद्र, वनस्थली, ग्राम, नगर तथा आकरों (खानों) सहित सारी पृथ्वी काँप उठी ॥ २२ ॥
शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च भेरीणां च सहस्रशः ।
तस्मिन् मुहूर्ते सम्प्राप्ते निर्घातश्च महानभूत् ॥ २३ ॥
उस शुभ मुहूर्त्तके आते ही शंख और दुन्दुभियोंके शब्द होने लगे। सहस्रों भेरियाँ बज उठीं। आकाशमें वायुके टकरानेका महान् शब्द होने लगा ॥ २३ ॥
अथास्त्रं जाज्वलद् घोरं पाण्डवस्यामितौजसः ।
मूर्तिमद् वै स्थितं पार्श्वे ददृशुर्देवदानवाः ॥ २४ ॥
तदनन्तर वह भयंकर अस्त्र मूर्तिमान् हो अग्निके समान प्रज्वलित तेजस्वीरूपसे अमित पराक्रमी पाण्डुनन्दन अर्जुनके पार्श्वभागमें खड़ा हो गया। यह बात देवताओं और दानवोंने प्रत्यक्ष देखी ॥ २४ ॥
स्पृष्टस्य त्र्यम्बकेनाथ फाल्गुनस्यामितौजसः ।
यत् किंचिदशुभं देहे तत् सर्वं नाशमीयिवत् ॥ २५ ॥
भगवान् शंकरके स्पर्श करनेसे अमित तेजस्वी अर्जुनके शरीरमें जो कुछ भी अशुभ था, वह नष्ट हो गया ॥ २५ ॥
स्वर्गं गच्छेत्यनुज्ञातस्त्र्यम्बकेण तदार्जुनः ।
प्रणम्य शिरसा राजन् प्राञ्जलिर्देवमैक्षत ॥ २६ ॥
उस समय भगवान् त्रिलोचनने अर्जुनको यह आज्ञा दी कि 'तुम स्वर्गलोकको जाओ।' राजन्! तब अर्जुनने भगवान्के चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखने लगे ॥ २६ ॥
ततः प्रभुस्त्रिदिवनिवासिनां वशी
महामतिर्गिरिश उमापतिः शिवः ।
धनुर्महद् दितिजपिशाचसूदनं
ददौ भवः पुरुषवराय गाण्डिवम् ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् देवताओंके स्वामी, जितेन्द्रिय एवं परम बुद्धिमान् कैलासवासी उमावल्लभ भगवान् शिवने पुरुषप्रवर अर्जुनको वह महान् गाण्डीवधनुष दे दिया, जो दैत्यों और पिशाचोंका संहार करनेवाला था ॥ २७ ॥