महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तानुरक्तान् सुहृदः सदा प्रियहिते रतान् । कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः ॥ २२ ॥ ‘निर्दयी शत्रुओंने आपको अधर्मपूर्वक जूएमंे हराया है, यह सुनकर हम सब लोग अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं। आपलोग हमारा त्याग न करें; क्योंकि हम आपके सेवक हैं, प्रेमी हैं, सुहृद् हैं और सदा आपके प्रिय एवं हितमें संलग्न रहनेवाले हैं। आपके बिना इस दुष्ट राजाके राज्यमें रहकर हम नष्ट होना नहीं चाहते ॥ २१-२२ ॥
श्रूयतां चाभिधास्यामो गुणदोषान् नरर्षभाः । शुभाशुभाधिवासेन संसर्गः कुरुते यथा ॥ २३ ॥ ‘नरश्रेष्ठ पाण्डवो! शुभ और अशुभ आश्रयमें रहनेपर वहाँका संसर्ग मनुष्यमें जैसे गुण-दोषोंकी सृष्टि करता है, उनका हम वर्णन करते हैं, सुनिये ॥ २३ ॥
वस्त्रमापस्तिलान् भूमिं गन्धो वासयते यथा । पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः ॥ २४ ॥ ‘जैसे फूलोंके संसर्गमें रहनेपर उनकी सुगन्ध वस्त्र, जल, तिल और भूमिको भी सुवासित कर देती है, उसी प्रकार संसर्गजनित गुण भी अपना प्रभाव डालते हैं ॥ २४ ॥
मोहजालस्य योनिर्हि मूढैरेव समागमः । अहन्यहनि धर्मस्य योनिः साधुसमागमः ॥ २५ ॥ ‘मूढ मनुष्योंसे मिलना-जुलना मोहजालकी उत्पत्तिका कारण होता है। इसी प्रकार साधु-महात्माओंका रंग प्रतिदिन धर्मकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ २५ ॥
तस्मात् प्राज्ञैश्च वृद्धैश्च सुस्वभावैस्तपस्विभिः । सद्भिborder सह संसर्गः कार्यः शमपरायणैः ॥ २६ ॥ ‘इसलिये विद्वानों, वृद्ध पुरुषों तथा उत्तम स्वभाववाले शान्तिपरायण तपस्वी सत्पुरुषोंका संग करना चाहिये ॥ २६ ॥
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च । ते सेव्यास्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी ॥ २७ ॥ निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु । पुण्यमेवाप्नुयामहे पापं पापोपसेवनात् ॥ २८ ॥ ‘जिन पुरुषोंके विद्या, जाति और कर्म—ये तीनों उज्ज्वल हों, उनका सेवन करना चाहिये; क्योंकि उन महापुरुषोंके साथ बैठना शास्त्रोंके स्वाध्यायसे भी बढ़कर है। हमलोग अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करते, तो भी पुण्यात्मा साधुपुरुषोंके समुदायमें रहनेसे हमें पुण्यकी ही प्राप्ति होगी। इसी प्रकार पापीजनोंके सेवनसे हम पापके ही भागी होंगे ॥ २७-२८ ॥
असतां दर्शनात् स्पर्शात् संजल्पाच्च सहासनात् । धर्माचाराः प्रहीयन्ते सिद्ध्यन्ति च न मानवाः ॥ २९ ॥