भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 323

'यह मेरा परम प्रिय अन्तर्धान नामक अस्त्र है। इसे ग्रहण करो। यह ओज, तेज और कान्ति प्रदान करनेवाला, शत्रुसेनाको सुला देनेवाला और समस्त वैरियोंका विनाश करनेवाला है ।। ३८ ।।

महात्मना शङ्करेण त्रिपुरं निहतं यदा । तदैतदस्त्रं निर्मुक्तं येन दग्धा महासुराः ।। ३९ ।।

'परमात्मा शंकरने जब त्रिपुरासुरके तीनों नगरोंका विनाश किया था, उस समय इस अस्त्रका उनके द्वारा प्रयोग किया गया था; जिससे बड़े-बड़े असुर दग्ध हो गये थे ।। ३९ ।।

त्वदर्थमुद्यतं चेदं मया सत्यपराक्रम । त्वमर्हो धारणे चास्य मेरुप्रतिमगौरव ।। ४० ।।

'सत्यपराक्रमी और मेरुके समान गौरवशाली पार्थ! तुम्हारे लिये यह अस्त्र मैंने उपस्थित किया है। तुम इसे धारण करनेके योग्य हो' ।। ४० ।।

ततोऽर्जुनो महाबाहुर्विधिवत् कुरुनन्दनः । कौबेरमधिजग्राह दिव्यमस्त्रं महाबलः ।। ४१ ।।

तब कुरुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु महाबली अर्जुनने कुबेरके उस 'अन्तर्धान' नामक दिव्य अस्त्रको ग्रहण किया ।। ४१ ।।

ततोऽब्रवीद् देवराजः पार्थमक्लिष्टकारिणम् । सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ।। ४२ ।।

तदनन्तर देवराज इन्द्रने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनको मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए मेघ और दुन्दुभिके समान गम्भीर स्वरसे कहा— ।। ४२ ।।

कुन्तीमातर्महाबाहो त्वमीशानः पुरातनः । परां सिद्धिमनुप्राप्तः साक्षाद् देवगतिं गतः ।। ४३ ।।

'महाबाहु कुन्तीकुमार! तुम पुरातन शासक हो। तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है। तुम साक्षात् देवगतिको प्राप्त हुए हो ।। ४३ ।।

देवकार्यं तु सुमहत् त्वया कार्यमरिंदम । आरोढव्यस्त्वया स्वर्गः सज्जीभव महाद्युते ।। ४४ ।।

'शत्रुदमन! तुम्हें देवताओंका बड़ा भारी कार्य सिद्ध करना है। महाद्युते! तैयार हो जाओ। तुम्हें स्वर्गलोकमें चलना है ।। ४४ ।।

रथो मातलिसंयुक्त आगन्ता त्वत्कृते महीम् । तत्र तेऽहं प्रदास्यामि दिव्यान्यस्त्राणि कौरव ।। ४५ ।।

'मातलिके द्वारा जोता हुआ दिव्य रथ तुम्हें लेनेके लिये पृथ्वीपर आनेवाला है। कुरुनन्दन! वहीं (स्वर्गमें) मैं तुम्हें दिव्यास्त्र प्रदान करूँगा' ।। ४५ ।।

तान् दृष्ट्वा लोकपालांस्तु समेतान् गिरिमूर्धनि । जगाम विस्मयं धीमान् कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। ४६ ।।