भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 329

आरुरोह रथं दिव्यं द्योतयन्निव भास्करः ।
ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुन शैलराजसे आज्ञा माँगकर उस दिव्य रथको देदीप्यमान करते हुए-से उसपर आरूढ़ हो गये, मानो सूर्य सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे हों ॥ २९ १/२ ॥

स तेनादित्यरूपेण दिव्येनाद्भुतकर्मणा ॥ ३० ॥
ऊर्ध्वमाचक्रमे धीमान् प्रहृष्टः कुरुनन्दनः ।
सोऽदर्शनपथं यातो मर्त्यानां धर्मचारिणाम् ॥ ३१ ॥
परम बुद्धिमान् कुरुनन्दन अर्जुन बड़े प्रसन्न होकर उस अद्भुत चालसे चलनेवाले सूर्यस्वरूप दिव्य रथके द्वारा ऊपरकी ओर जाने लगे। धीरे-धीरे धर्मात्मा मनुष्योंके दृष्टिपथसे दूर हो गये ॥ ३०-३१ ॥

ददर्शाद्भुतरूपाणि विमानानि सहस्रशः ।
न तत्र सूर्यः सोमो वा द्योतते न च पावकः ॥ ३२ ॥
ऊपर जाकर उन्होंने सहस्रों अद्भुत विमान देखे। वहाँ न सूर्य प्रकाशित होते हैं, न चन्द्रमा। अग्निकी प्रभा भी वहाँ काम नहीं देती है ॥ ३२ ॥

स्वयैव प्रभया तत्र द्योतन्ते पुण्यलब्धया ।
तारारूपाणि यानीह दृश्यन्ते द्युतिमन्ति वै ॥ ३३ ॥
दीपवद् विप्रकृष्टत्वात् तनूनि सुमहान्त्यपि ।