महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मराजके द्वारा इस प्रकार विनयपूर्वक अनुरोध किये जानेपर उन समस्त प्रजाओंने ‘हा! महाराज!’ ऐसा कहकर एक ही साथ भयंकर आर्तनाद किया॥ ३९॥
गुणान् पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः।
अकामाः संन्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान् ॥ ४० ॥
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके गुणोंका स्मरण करके प्रजावर्गके लोग दुःखसे पीडित और अत्यन्त आतुर हो गये। उनकी पाण्डवोंके साथ जानेकी इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी। वे केवल उनसे मिलकर लौट आये॥ ४० ॥
निवृत्तेषु तु पौरेषु रथानास्थाय पाण्डवाः।
आजग्मुर्जाह्नवीतीरे प्रमाणाख्यं महावटम् ॥ ४१ ॥
पुरवासियोंके लौट जानेपर पाण्डवगण रथोंपर बैठकर गंगाजीके किनारे प्रमाणकोटि नामक महान् वटके समीप आये॥ ४१ ॥
ते तं दिवसशेषेण वटं गत्वा तु पाण्डवाः।
ऊषुस्तां रजनीं वीराः संस्पृश्य सलिलं शुचि ॥ ४२ ॥
संध्या होते-होते उस वटके निकट पहुँचकर शूरवीर पाण्डवोंने पवित्र जलका स्पर्श (आचमन और संध्यावन्दन आदि) करके वह रात वहीं व्यतीत की॥ ४२ ॥
उदकेनैव तां रात्रिमुषूस्ते दुःखकर्शिताः।
अनुजग्मुश्च तत्रैतान् स्नेहात् केचिद् द्विजातयः ॥ ४३ ॥
दुःखसे पीड़ित हुए वे पाँचों पाण्डुकुमार उस रातमें केवल जल पीकर ही रह गये। कुछ ब्राह्मण-लोग भी इन पाण्डवोंके साथ स्नेहवश वहाँतक चले आये थे॥ ४३ ॥
साग्नयोऽनग्नयश्चैव सशिष्यगणबान्धवाः।
स तैः परिवृतो राजा शुशुभे ब्रह्मवादिभिः ॥ ४४ ॥
उनमेंसे कुछ साग्नि (अग्निहोत्री) थे और कुछ निरग्नि। उन्होंने अपने शिष्यों तथा भाई-बन्धुओंको भी साथ ले लिया था। वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले उन ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ ४४ ॥
तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहूर्ते रम्यदारुणे।
ब्रह्मघोषपुरस्कारः संजल्पः समजायत ॥ ४५ ॥
संध्याकालकी नैसर्गिक शोभासे रमणीय तथा राक्षस-पिशाचादिके संचरणका समय होनेसे अत्यन्त भयंकर प्रतीत होनेवाले उस मुहूर्तमें अग्नि प्रज्वलित करके वेद-मन्त्रोंके घोषपूर्वक अग्निहोत्र करनेके बाद उन ब्राह्मणोंमें परस्पर संवाद होने लगा॥ ४५ ॥
राजानं तु कुरुश्रेष्ठं ते हंसमधुरस्वराः।
आश्वासयन्तो विप्राग्र्याः क्षपां सर्वां व्यनोदयन् ॥ ४६ ॥