महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 358, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रातुमर्हसि विप्राग्र्य तपोबलसमन्वितः ॥ ३० ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! आप भी भूतलपर विचरनेवाले राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करते रहें; क्योंकि आप तपोबलसे सम्पन्न हैं ॥ ३० ॥
गिरिदुर्गेषु च सदा देशेषु विषमेषु च।
वसन्ति राक्षसा रौद्रास्तेभ्यो रक्षां विधास्यति ॥ ३१ ॥
‘पर्वतोंके दुर्गम स्थानोंमें तथा ऊँची-नीची भूमियोंमें भयंकर राक्षस निवास करते हैं; उनसे आप भाइयोंसहित युधिष्ठिरकी रक्षा कीजियेगा’ ॥ ३१ ॥
एवमुक्तो महेन्द्रेण बीभत्सुरपि लोमशम्।
उवाच प्रयतो वाक्यं रक्षेथाः पाण्डुनन्दनम् ॥ ३२ ॥
महेन्द्रके ऐसा कहनेपर अर्जुनने भी विनीत होकर लोमश मुनिसे कहा—‘मुने! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी भाइयोंसहित रक्षा कीजिये ॥ ३२ ॥
यथा गुप्तस्त्वया राजा चरेत् तीर्थानि सत्तम।
दानं दद्याद् यथा चैव तथा कुरु महामुने ॥ ३३ ॥
‘साधुशिरोमणे! महामुने! आपसे सुरक्षित रहकर राजा युधिष्ठिर तीर्थोंमें भ्रमण करें और दान दें—ऐसी कृपा कीजिये’ ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथेति सम्प्रतिज्ञाय लोमशः सुमहातपाः।
काम्यकं वनमुद्दिश्य समुपायान्महीत लम् ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ‘बहुत अच्छा’ कहकर महातपस्वी लोमशजीने उनका अनुरोध मान लिया और काम्यकवनमें जानेके लिये भूलोककी ओर प्रस्थान किया ॥ ३४ ॥
ददर्श तत्र कौन्तेयं धर्मराजमरिंदमम्।
तापसैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वतः परिवारितम् ॥ ३५ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने शत्रुदमन कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरको भाइयों तथा तपस्वी मुनियोंसे घिरा हुआ देखा ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि लोमशगमने
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें लोमशगमनविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥