भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

समर्थेनापि यन्मोहात् पुत्रस्ते न निवारितः ॥ १५ ॥ संजयने कहा— राजन्! आपके द्वारा यह बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, जिसकी आपने जान-बूझकर उपेक्षा की है (उसे रोकनेकी चेष्टा नहीं की है); वह यह है कि आपने समर्थ होते हुए भी मोहवश अपने पुत्रको कभी रोका नहीं ॥ १५ ॥ श्रुत्वा हि निर्जितान् द्यूते पाण्डवान् मधुसूदनः । त्वरितः काम्यके पार्थान् सम्भावयदच्युतः ॥ १६ ॥ भगवान् मधुसूदनने ज्यों ही सुना कि पाण्डव द्यूतमें पराजित हो गये, त्यों ही वे काम्यकवनमें पहुँचकर कुन्तीपुत्रोंसे मिले और उन्हें आश्वासन दिया ॥ १६ ॥ द्रुपदस्य तथा पुत्रा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । विराटो धृष्टकेतुश्च केकयाश्च महारथाः ॥ १७ ॥ इसी प्रकार द्रुपदके धृष्टद्युम्न आदि पुत्र, विराट, धृष्टकेतु और महारथी कैकय—इन सबने पाण्डवोंसे भेंट की ॥ १७ ॥ तैश्च यत् कथितं राजन् दृष्ट्वा पार्थान् पराजितान् । चारेण विदितं सर्वं तन्मयाऽऽवेदितं च ते ॥ १८ ॥ राजन्! पाण्डवोंको जूएमें पराजित देखकर उन सबने जो बातें कहीं, उन्हें गुप्तचरोंद्वारा जानकर मैंने आपकी सेवामें निवेदन कर दिया था ॥ १८ ॥ समागम्य वृतस्तत्र पाण्डवैर्मधुसूदनः । सारथ्ये फाल्गुनस्याजौ तथेत्याह च तान् हरिः ॥ १९ ॥ पाण्डवोंने मिलकर मधुसूदन श्रीकृष्णको युद्धमें अर्जुनका सारथि होनेके लिये वरण किया और श्रीहरिने 'तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया ॥ १९ ॥ अमर्षितो हि कृष्णोऽपि दृष्ट्वा पार्थांस्तथा गतान् । कृष्णाजिनोत्तरासंगानब्रवीच्च युधिष्ठिरम् ॥ २० ॥ भगवान् श्रीकृष्ण भी कुन्तीपुत्रोंको उस अवस्थामें काला मृगचर्म ओढ़कर आये हुए देख उस समय अमर्षमें भर गये और युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥ या सा समृद्धिः पार्थानामिन्द्रप्रस्थे बभूव ह । राजसूये मया दृष्टा नृपैरन्यैः सुदुर्लभा ॥ २१ ॥ 'इन्द्रप्रस्थमें कुन्तीकुमारोंके पास जो समृद्धि थी तथा राजसूययज्ञके समय जिसे मैंने अपनी आँखों देखा था, वह अन्य नरेशोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ थी ॥ २१ ॥ यत्र सर्वान् महीपालाञ्छस्त्रतेजोभयार्दितान् । सवङ्गाङ्गान् सपौण्ड्रोड्रान् सचोलद्राविडान्ध्रकान् ॥ २२ ॥ सागरानूपकांश्चैव ये च प्रान्ताभिवासिनः । सिंहलान् बर्बरान् म्लेच्छान् ये च लङ्कानिवासिनः ॥ २३ ॥ पश्चिमानि च राष्ट्राणि शतशः सागरान्तिकान् ।