भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 378

पाण्डव राज्य छिन जानेसे तो दुःखी थे ही। अर्जुनके विरहसे वे और भी क्लेशमें पड़ गये थे। उस समय महाबाहु भीमने युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ५ ॥ निदेशात् ते महाराज गतोऽसौ भरतर्षभः । अर्जुनः पाण्डुपुत्राणां यस्मिन् प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥ ६ ॥ ‘महाराज! आपकी आज्ञासे भरतवंशका रत्न अर्जुन तपस्याके लिये चला गया। हम सब पाण्डवोंके प्राण उसीमें बसते हैं ॥ ६ ॥ यस्मिन् विनष्टे पाञ्चालाः सह पुत्रैस्तथा वयम् । सात्यकिर्वासुदेवश्च विनश्येयुर्न संशयः ॥ ७ ॥ ‘यदि कहीं अर्जुनका नाश हुआ तो पुत्रोंसहित पांचाल, हम पाण्डव, सात्यकि और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण—ये सब-के-सब नष्ट हो जायँगे ॥ ७ ॥ योऽसौ गच्छति धर्मात्मा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् । भवन्नियोगाद् बीभत्सुस्ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ८ ॥ ‘जो धर्मात्मा अर्जुन अनेक प्रकारके क्लेशोंका चिन्तन करते हुए आपकी आज्ञासे तपस्याके लिये गया, उससे बढ़कर दुःख और क्या होगा? ॥ ८ ॥ यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः । मन्यामहे जितानाजौ परान् प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ ९ ॥ ‘जिस महापराक्रमी अर्जुनके बाहुबलका आश्रय लेकर हम संग्राममें शत्रुओंको पराजित और इस पृथ्वीको अपने अधिकारमें आयी हुई समझते हैं ॥ ९ ॥ यस्य प्रभावान्न मया सभामध्ये धनुष्मतः । नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्राः ससौबलाः ॥ १० ॥ ‘जिस धनुर्धर वीरके प्रभावसे प्रभावित होकर मैंने सभामें शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको तुरंत ही यमलोक नहीं भेज दिया ॥ १० ॥ ते वयं बाहुबलिनः क्रोधमुत्थितमात्मनः । सहामहे भवन्मूलं वासुदेवेन पालिताः ॥ ११ ॥ ‘हम सब लोग बाहुबलसे सम्पन्न हैं और भगवान् वासुदेव हमारे रक्षक हैं तो भी हम आपके कारण अपने उठे हुए क्रोधको चुपचाप सह लेते हैं ॥ ११ ॥ वयं हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान् परान् । स्वबाहुविजितां कृत्स्नां प्रशासैम वसुन्धराम् ॥ १२ ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्णके साथ हमलोग कर्ण आदि शत्रुओंको मारकर अपने बाहुबलसे जीती हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन कर सकते हैं ॥ १२ ॥ भवतो द्यूतदोषेण सर्वे वयमुपप्लुताः । अहीनपौरुषा बाला बलिभिर्बलवत्तराः ॥ १३ ॥