भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता ह्यपि कुर्वते । विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचारावलम्बिषु ॥ ६ ॥ देवता भी अपने भक्तोंपर विशेषतः सदाचारपरायण ब्राह्मणोंपर तो अवश्य ही दया करते हैं ॥ ६ ॥

युधिष्ठिर उवाच ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः । सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम् ॥ ७ ॥ आहरेयुरिमे येऽपि फलमूलमधूनि च । त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः ॥ ८ ॥ युधिष्ठिर बोले— विप्रगण! मेरे मनमें भी ब्राह्मणोंके प्रति उत्तम भक्ति है, किंतु यह सब प्रकारके सहायक साधनोंका अभाव ही मुझे दुःखमग्न-सा किये देता है। जो फल-मूल एवं शहद आदि आहार जुटाकर ला सकते थे वे ही ये मेरे भाई शोकजनित दुःखसे मोहित हो रहे हैं ॥ ७-८ ॥ द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च । दुःखार्दितानिमान् क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे ॥ ९ ॥ द्रौपदीके अपमान तथा राज्यके अपहरणके कारण ये दुःखसे पीडित हो रहे हैं, अतः मैं इन्हें (आहार जुटानेका आदेश देकर) अधिक क्लेशमें नहीं डालना चाहता ॥ ९ ॥

ब्राह्मणा ऊचुः अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत् ते हृदि पार्थिव । स्वयमाहृत्य चान्नानि त्वानुयास्यामहे वयम् ॥ १० ॥ ब्राह्मण बोले— पृथ्वीनाथ! आपके हृदयमें हमारे पालन-पोषणकी चिन्ता नहीं होनी चाहिये। हम स्वयं ही अपने लिये अन्न आदिकी व्यवस्था करके आपके साथ चलेंगे ॥ १० ॥ अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव । कथाभिश्चाभिरम्याभिः सह रंस्यामहे वयम् ॥ ११ ॥ हम आपके अभीष्टचिन्तन और जपके द्वारा आपका कल्याण करेंगे तथा आपको सुन्दर-सुन्दर कथाएँ सुनाकर आपके साथ ही प्रसन्नतापूर्वक वनमें विचरेंगे ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच एवमेतन्न संदेहो रमेऽहं सततं द्विजैः । न्यूनभावात् तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः ॥ १२ ॥