महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवाः । वने निवसतौ राजञ्छिष्यन्ते स्म कदाचन ॥ ५७ ॥ राजन्! उनके साथ न सेवक थे न रथ, न भाई थे न बान्धव। वनमें रहते समय उनके पास ये वस्तुएँ कदापि शेष नहीं थीं ॥ ५७ ॥ भवान् हि संवृतो वीरैर्भ्रातृभिर्देवसम्मितैः । ब्रह्मकल्पैर्द्विजाग्र्यैश्च तस्मान्नार्हसि शोचितुम् ॥ ५८ ॥ तुम तो देवतुल्य पराक्रमी वीर भाइयोंसे घिरे हुए हो। ब्रह्माजीके समान तेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारे चारों ओर बैठे हुए हैं। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेणाहमिच्छामि नलस्य सुमहात्मनः । चरितं वदतां श्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ ५९ ॥ युधिष्ठिर बोले—वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! मैं उत्तम महामना राजा नलका चरित्र विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें बृहदश्वयुधिष्ठिरसंवादविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥