महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ
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एवमुक्ता तु हंसेन दमयन्ती विशाम्पते ॥ ३१ ॥
अब्रवीत् तत्र तं हंसं त्वमप्येवं नले वद ।
तथेत्युक्त्वाण्डजः कन्यां विदर्भस्य विशाम्पते ।
पुनरागम्य निषधान् नले सर्वं न्यवेदयत् ॥ ३२ ॥
राजन्! हंसके इस प्रकार कहनेपर दमयन्तीने उससे कहा—'पक्षिराज! तुम नलके निकट भी ऐसी ही बातें कहना'। राजन्! विदर्भराजकुमारी दमयन्तीसे 'तथास्तु' कहकर वह हंस पुनः निषधदेशमें आया और उसने नलसे सब बातें निवेदन कीं ॥ ३१-३२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि हंसदमयन्तीसंवादे
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें हंसदमयन्तीसंवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥