भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 402

'जिन लोकस्रष्टा महामना ईश्वरोंके चरणोंकी धूलके समान भी मैं नहीं हूँ, उन्हींकी ओर तुम्हें मन लगाना चाहिये ।। ६ ।। विप्रियं ह्याचरन् मर्त्यो देवानां मृत्युमृच्छति । त्राहि मामनवद्याङ्गि वरयस्व सुरोत्तमान् ।। ७ ।। 'निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! देवताओंके विरुद्ध चेष्टा करनेवाला मानव मृत्युको प्राप्त हो जाता है; अतः तुम मुझे बचाओ और उन श्रेष्ठ देवताओंका ही वरण करो ।। विरजांसि च वासांसि दिव्यांश्चित्राः स्रजस्तथा । भूषणानि तु मुख्यानि देवान् प्राप्य तु भुङ्क्ष्व वै ।। ८ ।। 'तथा देवताओंको ही पाकर निर्मल वस्त्र, दिव्य एवं विचित्र पुष्पहार तथा मुख्य-मुख्य आभूषणोंका सुख भोगो ।। ८ ।। य इमां पृथिवीं कृत्स्नां संक्षिप्य ग्रसते पुनः । हुताशमीशं देवानां का तं न वरयेत् पतिम् ।। ९ ।। 'जो इस सारी पृथिवीको संक्षिप्त करके पुनः अपना ग्रास बना लेते हैं, उन देवेश्वर अग्निको कौन नारी अपना पति न चुनेगी? ।। ९ ।। यस्य दण्डभयात् सर्वे भूतग्रामाः समागताः । धर्ममेवानुरुध्यन्ति का तं न वरयेत् पतिम् ।। १० ।। 'जिनके दण्डके भयसे संसारमें आये हुए समस्त प्राणिसमुदाय धर्मका ही पालन करते हैं, उन यमराजको कौन अपना पति नहीं वरेगी? ।। १० ।। धर्मात्मानं महात्मानं दैत्यदानवमर्दनम् । महेन्द्रं सर्वदेवानां का तं न वरयेत् पतिम् ।। ११ ।। 'दैत्यों और दानवोंका मर्दन करनेवाले धर्मात्मा महामना सर्वदेवेश्वर महेन्द्रका कौन नारी पतिरूपमें वरण न करेगी? ।। ११ ।। क्रियतामविशङ्केन मनसा यदि मन्यसे । वरुणं लोकपालानां सुहृद्वाक्यमिदं शृणु ।। १२ ।। 'यदि तुम ठीक समझती हो तो लोकपालोंमें प्रसिद्ध वरुणको निःशंक होकर अपना पति बनाओ। यह एक हितैषी सुहृद्का वचन है, इसे सुनो' ।। १२ ।। नैषधेनैवमुक्ता सा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् । समाप्लुताभ्यां नेत्राभ्यां शोकजेनाथ वारिणा ।। १३ ।। तदनन्तर निषधराज नलके ऐसा कहनेपर दमयन्ती शोकाश्रुओंसे भरे हुए नेत्रोंद्वारा देखती हुई इस प्रकार बोली— ।। १३ ।। देवेभ्योऽहं नमस्कृत्य सर्वेभ्यः पृथिवीपते । वृणे त्वामेव भर्तारं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। १४ ।।