भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

राजा नलको पहचान न सकी ॥ ११ ॥ यं यं हि ददृशे तेषां तं तं मेने नलं नृपम् । सा चिन्तयन्ती बुद्ध्याथ तर्कयामास भाविनी ॥ १२ ॥ वह उनमेंसे जिस-जिस व्यक्तिपर दृष्टि डालती, उसी-उसीको राजा नल समझने लगती थी। वह भाविनी राजकन्या बुद्धिसे सोच-विचारकर मन-ही-मन तर्क करने लगी ॥ १२ ॥ कथं हि देवाञ्जानीयां कथं विद्यां नलं नृपम् । एवं संचिन्तयन्ती सा वैदर्भी भृशदुःखिता ॥ १३ ॥ 'अहो! मैं कैसे देवताओंको जानूँ और किस प्रकार राजा नलको पहिचानूँ।' इस चिन्तामें पड़कर विदर्भराजकुमारी दमयन्तीको बड़ा दुःख हुआ ॥ १३ ॥ श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत । देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे ॥ १४ ॥ तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्यापि न लक्षये । सा विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ॥ १५ ॥ शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत । भारत! उसने अपने सुने हुए देवचिह्नोंपर भी विचार किया। वह मन-ही-मन कहने लगी 'मैंने बड़े-बूढ़े पुरुषोंसे देवताओंकी पहचान करानेवाले जो लक्षण या चिह्न सुन रखे हैं, उन्हें यहाँ भूमिपर बैठे हुए इन पाँच पुरुषोंमेंसे किसी एकमें भी नहीं देख पाती हूँ।' उसने अनेक प्रकारसे निश्चय और बार-बार विचार करके देवताओंकी शरणमें जाना ही समयोचित कर्तव्य समझा ॥ १४-१५ ½ ॥ वाचा च मनसा चैव नमस्कारं प्रयुज्य सा ॥ १६ ॥ देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमब्रवीत् । हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नैषधो वृतः । पतित्वे तेन सत्येन देवास्तं प्रदिशन्तु मे ॥ १७ ॥ तत्पश्चात् मन एवं वाणीद्वारा देवताओंको नमस्कार करके दोनों हाथ जोड़कर काँपती हुई वह इस प्रकार बोली—'मैंने हंसोंकी बात सुनकर निषधनरेश नलका पतिरूपमें वरण कर लिया है। इस सत्यके प्रभावसे देवतालोग स्वयं ही मुझे राजा नलकी पहचान करा दें ॥ मनसा वचसा चैव यथा नाभिचराम्यहम् । तेन सत्येन विबुधास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥ १८ ॥ 'यदि मैं मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा कभी सदाचारसे च्युत नहीं हुई हूँ तो उस सत्यके प्रभावसे देवतालोग मुझे राजा नलकी ही प्राप्ति करावें ॥ १८ ॥ यथा देवैः स मे भर्ता विहितो निषधाधिपः । तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥ १९ ॥