भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 414

इस प्रकार राजा नलको वरदान देकर वे देवता-लोग स्वर्गलोकको चले गये। स्वयंवरमें आये हुए राजा भी विस्मयविमुग्ध हो नल और दमयन्तीके विवाहोत्सवका-सा अनुभव करते हुए प्रसन्नतापूर्वक जैसे आये थे, वैसे लौट गये ॥ ३९ १/२ ॥

गतेषु पार्थिवेंद्रेषु भीमः प्रीतो महामनाः ॥ ४० ॥ विवाहं कारयामास दमयन्त्या नलस्य च । सब नरेशोंके विदा हो जानेपर महामना भीमने बड़ी प्रसन्नताके साथ नल-दमयन्तीका शास्त्रविधिके अनुसार विवाह कराया ॥ ४० १/२ ॥

उष्य तत्र यथाकामं नैषधो द्विपदां वरः ॥ ४१ ॥ भीमेन समनुज्ञातो जगाम नगरं स्वकम् । मनुष्योंमें श्रेष्ठ निषधनरेश नल अपनी इच्छाके अनुसार कुछ दिनोंतक ससुरालमें रहे, फिर विदर्भनरेश भीमकी आज्ञा ले (दमयन्तीसहित) अपनी राजधानीको चले गये ॥ ४१ १/२ ॥

अवाप्य नारीरत्नं तु पुण्यश्लोकोऽपि पार्थिवः ॥ ४२ ॥ रेमे सह तया राजञ्छच्येव बलवृत्रहा । राजन्! पुण्यश्लोक महाराज नलने भी उस रमणीरत्नको पाकर उसके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे शचीके साथ इन्द्र करते हैं ॥ ४२ १/२ ॥

अतीव मुदितो राजा भ्राजमानोऽंशुमानिव ॥ ४३ ॥ अरञ्जयत् प्रजा वीरो धर्मेण परिपालयन् । राजा नल सूर्यके समान प्रकाशित होते थे। वीरवर नल अत्यन्त प्रसन्न रहकर अपनी प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए उसे प्रसन्न रखते थे ॥ ४३ १/२ ॥

ईजे चाप्यश्वमेधेन ययातिरिव नाहुषः ॥ ४४ ॥ अन्यैश्च बहुभिर्धीमान् क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः । उन बुद्धिमान् नरेशने नहुषनन्दन ययातिकी भाँति अश्वमेध तथा पर्याप्त दक्षिणावाले दूसरे बहुत-से यज्ञोंका भी अनुष्ठान किया ॥ ४४ १/२ ॥

पुनश्च रमणीयेषु वनेषूपवनेषु च ॥ ४५ ॥ दमयन्त्या सह नलो विजहारामरोपमः । तदनन्तर देवतुल्य राजा नलने दमयन्तीके साथ रमणीय वनों और उपवनोंमें विहार किया ॥ ४५ १/२ ॥

जनयामास च ततो दमयन्त्यां महामनाः । इन्द्रसेनं सुतं चापि इन्द्रसेनां च कन्यकाम् ॥ ४६ ॥ महामना नलने दमयन्तीके गर्भसे इन्द्रसेन नामक एक पुत्र और इन्द्रसेना नामवाली एक कन्याको जन्म दिया ॥ ४६ ॥