भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 439, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 439

नाकाले विहितो मृत्युर्मर्त्यानां पुरुषर्षभ । तत्र कान्ता त्वयोत्सृष्टा मुहूर्तंमपि जीवति ॥ ७ ॥ ‘पुरुषशिरोमणे! मनुष्योंकी मृत्यु असमयमें नहीं होती, तभी तो आपकी यह प्रियतमा आपसे परित्यक्त होकर दो घड़ी भी जी रही है ॥ ७ ॥ पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान् पुरुषर्षभ । भीताहमतिदुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्वर ॥ ८ ॥ ‘पुरुषश्रेष्ठ! यहाँ इतना ही परिहास बहुत है। अत्यन्त दुर्धर्ष वीर! मैं बहुत डर गयी हूँ। प्राणेश्वर! अब मुझे अपना दर्शन दीजिये ॥ ८ ॥ दृश्यसे दृश्यसे राजन्नेष दृष्टोऽसि नैषध । आवार्य गुल्मैरात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ ९ ॥ ‘राजन्! निषधनरेश! आप दीख रहे हैं, दीख रहे हैं, यह दिखायी दिये। लताओंद्वारा अपनेको छिपाकर आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं? ॥ ९ ॥ नृशंसं बत राजेन्द्र यन्मामेवंगतामिह । विलपन्तीं समागम्य नाश्वासयसि पार्थिव ॥ १० ॥ ‘राजेन्द्र! मैं इस प्रकार भय और चिन्तामें पड़कर यहाँ विलाप कर रही हूँ और आप आकर आश्वासन भी नहीं देते! भूपाल! यह तो आपकी बड़ी निर्दयता है ॥ १० ॥ न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन । कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि ॥ ११ ॥ ‘नरेश्वर! मैं अपने लिये शोक नहीं करती। मुझे दूसरी किसी बातका भी शोक नहीं है। मैं केवल आपके लिये शोक कर रही हूँ कि आप अकेले कैसी शोचनीय दशामें पड़ जायेंगे! ॥ ११ ॥ कथं नु राजंस्तृषितः क्षुधितः श्रमकर्षितः । सायाह्ने वृक्षमूलेषु मामपश्यन् भविष्यसि ॥ १२ ॥ ‘राजन्! आप भूखे-प्यासे और परिश्रमसे थके-माँदे होकर जब सायंकाल किसी वृक्षके नीचे आकर विश्राम करेंगे, उस समय मुझे अपने पास न देखकर आपकी कैसी दशा हो जायगी?’ ॥ १२ ॥ ततः सा तीव्रशोकार्ता प्रदीप्तेव च मन्युना । इतश्चेतश्च रुदती पर्यधावत दुःखिता ॥ १३ ॥ तदनन्तर प्रचण्ड शोकसे पीड़ित हो क्रोधाग्निसे दग्ध होती हुई-सी दमयन्ती अत्यन्त दुःखी हो रोने और इधर-उधर दौड़ने लगी ॥ १३ ॥ मुहुरुत्पतते बाला मुहुः पतति विह्वला । मुहुरालीयते भीता मुहुः क्रोशति रोदिति ॥ १४ ॥

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