भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 445

दुर्धर्षां तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव ॥ ३६ ॥ यद्यपि वह नीच पापात्मा व्याध उसपर बलात्कार करनेके लिये व्याकुल हो गया था, परंतु दमयन्ती अग्निशिखाकी भाँति उद्दीप्त हो रही थी; अतः उसका स्पर्श करना उसको अत्यन्त दुष्कर प्रतीत हुआ ॥ ३६ ॥

दमयन्ती तु दुःखार्ता पतिराज्यविनाकृता । अतीतवाक्पथे काले शशापैनं रुषान्विता ॥ ३७ ॥ पति तथा राज्य दोनोंसे वंचित होनेके कारण दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही थी। इधर व्याधकी कुचेष्टा वाणीद्वारा रोकनेपर रुक सके, ऐसी प्रतीत नहीं होती थी। तब (उस व्याधपर अत्यन्त रुष्ट हो) उसने उसे शाप दे दिया— ॥ ३७ ॥

यद्यहं नैषधादन्यं मनसापि न चिन्तये । तथायं पततां क्षुद्रो परासुर्मृगजीवनः ॥ ३८ ॥ ‘यदि मैं निषधराज नलके सिवा दूसरे किसी पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती होऊँ, तो इसके प्रभावसे यह तुच्छ व्याध प्राणशून्य होकर गिर पड़े’ ॥ ३८ ॥

उक्तमात्रे तु वचने तथा स मृगजीवनः । व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ॥ ३९ ॥ दमयन्तीके इतना कहते ही वह व्याध आगसे जले हुए वृक्षकी भाँति प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥