महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 464, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चषष्टितमोऽध्यायः
जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दुःखित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास
बृहदश्व उवाच
सा तच्छ्रुत्वानवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा ।
जगाम सह तेनैव सार्थेन पतिलालसा ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! दलके संचालककी वह बात सुनकर निर्दोष एवं सुन्दर अंगोंवाली दमयन्ती पतिदेवके दर्शनके लिये उत्सुक हो व्यापारियोंके उस दलके साथ ही यात्रा करने लगी ॥ १ ॥
अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे ।
तडागं सर्वतोभद्रं पद्मंसौगन्धिकं महत् ॥ २ ॥
ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् ।
बहुपुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् ॥ ३ ॥
तदनन्तर बहुत समयके बाद एक भयंकर विशाल वनमें पहुँचकर उन व्यापारियोंने एक महान् सरोवर देखा, जिसका नाम था, पद्मसौगन्धिक। वह सब ओरसे कल्याणप्रद जान पड़ता था। उस रमणीय सरोवरके पास घास और ईंधनकी अधिकता थी, फूल और फल भी वहाँ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते थे। उस तालाबपर बहुत-से पक्षी निवास करते थे ॥ २-३ ॥
निर्मलस्वादुसलिलं मनोहारि सुशीतलम् ।
सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः ॥ ४ ॥
सरोवरका जल स्वच्छ और स्वादु था, वह देखनेमें बड़ा ही मनोहर और अत्यन्त शीतल था। व्यापारियोंके वाहन बहुत थक गये थे। इसलिये उन्होंने वहीं पड़ाव डालनेका निश्चय किया ॥ ४ ॥
सम्मते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् ।
उवास सार्थः सुमहान् वेलामासाद्य पश्चिमाम् ॥ ५ ॥
समूहके अधिपतिसे अनुमति लेकर सब लोगोंने उस उत्तम वनमें प्रवेश किया और वह महान् जनसमुदाय सरोवरके पश्चिम तटपर ठहर गया ॥ ५ ॥
अथार्धरात्रसमये निःशब्दस्तिमिते तदा ।
सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् ॥ ६ ॥
पानीयार्थं गिरिनदीं मदप्रस्रवणाविलाम् ।