महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 479, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन् विषनिमित्ता च न ते पीडा भविष्यति । संग्रामेषु च राजेन्द्र शश्वज्जयमवाप्स्यसि ॥ १९ ॥ 'राजन्! आपको विषजनित पीड़ा कभी नहीं होगी। राजेन्द्र! आप युद्धमें भी सदा विजय प्राप्त करेंगे ॥ १९ ॥ गच्छ राजन्नितः सूतो बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् । समीपमृतुपर्णस्य स हि चैवाक्षनैपुणः ॥ २० ॥ 'राजन्! अब आप यहाँसे अपनेको बाहुक नामक सूत बताते हुए राजा ऋतुपर्णके समीप जाइये। वे द्यूतविद्यामें बड़े निपुण हैं ॥ २० ॥ अयोध्यां नगरीं रम्यामद्य वै निषधेश्वर । स तेऽक्षहृदयं दाता राजाश्वहृदयेन वै ॥ २१ ॥ इक्ष्वाकुकुलजः श्रीमान् मित्रं चैव भविष्यति । भविष्यसि यदाक्षज्ञः श्रेयसा योक्ष्यसे तदा ॥ २२ ॥ 'निषधेश्वर! आप आज ही रमणीय अयोध्यापुरीको चले जाइये। इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न श्रीमान् राजा ऋतुपर्ण आपसे अश्वविद्याका रहस्य सीखकर बदलेमें आपको द्यूतक्रीड़ाका रहस्य बतलायेंगे और आपके मित्र भी हो जायँगे। जब आप द्यूतविद्याके ज्ञाता होंगे, तब पुनः कल्याणभागी हो जायँगे ॥ २१-२२ ॥ सममेष्यसि दारैस्त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः । राज्येन तनयाभ्यां च सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २३ ॥ 'मैं सच कहता हूँ, आप एक ही साथ अपनी पत्नी, दोनों संतानों तथा राज्यको प्राप्त कर लेंगे; अतः अपने मनमें चिन्ता न कीजिये ॥ २३ ॥ स्वं रूपं च यदा द्रष्टुमिच्छेथास्त्वं नराधिप । संस्मर्त्तव्यस्तदा तेऽहं वासश्चेदं निवासयेः ॥ २४ ॥ 'नरेश्वर! जब आप अपने (पहलेवाले) रूपको देखना चाहें, उस समय मेरा स्मरण करें और इस कपड़ेको ओढ़ लें ॥ २४ ॥ अनेन वाससाच्छन्नः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यसे । इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यं वासोयुगं तदा ॥ २५ ॥ 'इस वस्त्रसे आच्छादित होते ही आप अपना पहला रूप प्राप्त कर लेंगे।' ऐसा कहकर नागने उन्हें दो दिव्य वस्त्र प्रदान किये ॥ २५ ॥ एवं नलं च संदिश्य वासो दत्त्वा च कौरव । नागराजस्ततो राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २६ ॥ कुरुनन्दन युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा नलको संदेश और वस्त्र देकर नागराज कर्कोटक वहीं अन्तर्धान हो गया ॥